न ईमा-ए-ख़्वाहिश न इज़हार-ए-मतलब — दाग़ देहलवी

न ईमा-ए-ख़्वाहिश न इज़हार-ए-मतलब मिरे मुँह को अहल-ए-करम देखते हैं

“Neither a hint of desire, nor a plea made known—yet upon my face, the eyes of the generous rest.”

— दाग़ देहलवी

अर्थ

मैंने न तो अपनी किसी इच्छा का कोई इशारा किया और न ही अपनी ज़रूरत ज़ाहिर की, फिर भी उदार लोग मेरा चेहरा देख रहे हैं।

विस्तार

इस शेर में आत्मसम्मान और ख़ामोश गरिमा का बेहद ख़ूबसूरत इज़हार है। शायर कहता है कि न तो उसने किसी चाहत का हल्का सा इशारा किया और न ही अपनी कोई ज़रूरत जुबान पर लाई, फिर भी मदद करने वाले बस उसी के चेहरे को ताकते रह जाते हैं। यह ख़ामोशी इतनी बा-असर और पुरवक़ार है कि बिना कुछ माँगे ही चेहरे का नूर और स्वाभिमान सामने वाले को मुतास्सिर कर देता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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