ग़रज़ क्या कि समझें मिरे ख़त का मज़मूँ — दाग़ देहलवी
“Why would they care to comprehend the substance of my plea? They merely look upon the title and the style of calligraphy.”
अर्थ
उन्हें मेरे ख़त के मज़मून (विषय) को समझने की क्या परवाह, वे तो बस उसका शीर्षक और लिखावट का अंदाज़ देखते हैं।
विस्तार
इस शेर में शायर उस बेबसी को बयां कर रहा है जब कोई आपके जज़्बातों को समझने के बजाय सिर्फ़ बाहरी दिखावे पर ध्यान देता है। आशिक़ ने ख़त में अपनी रूह का सारा दर्द उड़ेल दिया, मगर माशूक़ सिर्फ़ उसकी लिखावट की ख़ूबसूरती और ऊपर का उनवान देखकर दाद देने लगा। यह इंसान के उस अकेलेपन की दास्तान है जहाँ दुनिया हमारे रंज-ओ-ग़म की कारीगरी की तो तारीफ़ करती है, लेकिन दिल की असली तड़प को महसूस नहीं करती।
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