غزل
हम से कुछ आगे ज़माने में हुआ क्या क्या कुछ
हम से कुछ आगे ज़माने में हुआ क्या क्या कुछ
یہ غزل زندگی کے تجربات اور وقت کے گزرنے پر ایک غور و فکر پر مبنی نکتہ نظر پیش کرتی ہے۔ شاعر یہ سوال کرتا ہے کہ کیا زمانے میں کچھ ایسا ہوا ہے جو پہلے کبھی نہیں ہوا، اور کیا ہم اس تبدیلی سے بے خبر ہیں۔ غزل بتاتی ہے کہ محبت اور غم کے اثر سے دل، جگر اور جان سب کچھ بدل گیا ہے۔
نغمے لوڈ ہو رہے ہیں…
00
1
हम से कुछ आगे ज़माने में हुआ क्या क्या कुछ
तो भी हम ग़ाफ़िलों ने आ के क्या क्या कुछ
ہمارے سے پہلے زمانے میں کیا کیا ہوا، اور ہم غافلوں نے آ کر کیا کیا۔
2
दिल जिगर जान ये भसमनत हुए सीने में
घर को आतिश दी मोहब्बत ने जला क्या क्या कुछ
میرے سینے میں دل، جگر اور جان بھسمنت ہوئے ہیں؛ मोहब्बत نے گھر کو آگ لگا دی، کیا کیا کچھ جلا دیا۔
3
क्या कहूँ तुझ से कि क्या देखा है तुझ में मैं ने
इशवा-ओ-ग़मज़ा-ओ-अंदाज़-ओ-अदा क्या क्या कुछ
میں تجھ سے کیا کہوں کہ میں نے تجھ میں کیا کیا دیکھا ہے؛ اِشوا، اور غم، اور انداز، اور ادا—کیا کیا چیزیں۔
4
दिल गया होश गया सब्र गया जी भी गया
शग़्ल में ग़म के तिरे हम से गया क्या क्या कुछ
میرا دل، ہوش، صبر اور جان سب کچھ کھو گیا ہے؛ تمہارے غم کے جادو میں تم نے مجھ سے کیا کیا کچھ لے لیا؟
5
आह मत पूछ सितमगार कि तुझ से थी हमें
चश्म-ए-लुतफ़-ओ-करम-ओ-महर-ओ-वफ़ा क्या क्या कुछ
آہ مت پوچھ ستمگار کہ تجھ سے تھی ہمیں چشمِ لطف و کرم و محب و وفا کیا کیا کچھ۔
6
नाम हैं ख़स्ता-ओ-आवारा-ओ-बदनाम मिरे
एक 'आलम ने ग़रज़ मुझ को कहा क्या क्या कुछ
میرا نام خستہ-ओ-آوارہ-ओ-بدمنام ہے؛ / اک عالم نے غرض مجھ کو کہا کیا کیا کچھ।
7
तरफ़ा-ए-सोहबत है कि सुनता नहीं तू एक मिरी
वास्ते तेरे सुना मैं ने सुना क्या क्या कुछ
اے صحبت کی طرف، تو میری بات نہیں سنتا؛ تیرے لیے، میں نے کیا کیا کچھ سنایا۔
8
हसरत-ए-वसल-ओ-ग़म-ए-हिजर-ओ-ख़्याल-ए-रुख़-ए-दोस्त
मर गया मैं पे मिरे जी में रहा क्या क्या कुछ
میرے جی میں کیا کیا ہوا، میں مر گیا۔ (یہ مصرع محبت کی یادوں اور جذبات کے شدید تجربے کو ظاہر کرتا ہے۔)
9
दर्द-ए-दिल ज़ख़्म-ए-जिगर कुल्फ़त-ए-ग़म दाग़-ए-फ़िराक़
आह 'आलम से मिरे साथ चला क्या क्या कुछ
دل کا درد، زخمِ جگر، گُم کی کُلفت اور داغِ فراق؛ آہ 'عالم سے میرے ساتھ کیا کیا کچھ چلا۔
10
चश्म-ए-नमनाक ओ दिल-ए-पुर जिगर-ए-सद-पारा
दौलत-ए-इश्क़ से हम पास भी था क्या क्या कुछ
چشمِ نمناک او دلِ پر جگرِ اے صد پارا، دولتِ عشق سے ہم پاس بھی تھا کیا کیا کچھ
11
तुझ को क्या बनने बिगड़ने से ज़माने के कि याँ
ख़ाक किन किन की हुई सिर्फ़ बना क्या क्या कुछ
زमाने की नज़रों में बनने یا بگڑنے سے کیا فرق پڑتا ہے؟ یہ تو صرف خاک ہے کہ کیا کیا بنا اور کیا کیا بگڑ گیا۔
12
क़िबला-ओ-का'बा ख़ुदा-वंद-ओ-मलाज़-ओ-मुशफ़िक़
मुज़्तरिब हो के उसे मैं ने लिखा क्या क्या कुछ
قبلا و کعبہ، خدا وند و ملز و مشفق، مضطرب ہو کے اسے میں نے لکھا کیا کیا کچھ
13
पर कहूँ क्या रक़म शौक़ की अपने तासीर
हर सर-ए-हर्फ़ पे वो कहने लगा क्या क्या कुछ
میں اپنی پسند (شوق) کی قیمت (رقم) کیسے بتاؤں؟ وہ ہر حرف پر کچھ نہ کچھ کہنے لگا۔
14
एक महरूम चले 'मीर' हमें 'आलम से
वर्ना 'आलम को ज़माने ने दिया क्या क्या कुछ
ایک محروم چلا 'میر' ہمیں 'عالم' سے، ورنہ 'عالم' کو زمانے نے دیا کیا کیا کچھ
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