ग़ज़ल

अबस है नाज़-ए-इस्तिग़्ना पे कल की क्या ख़बर क्या हो

عبث ہے ناز استغنا پہ کل کی کیا خبر کیا ہو
नज़्म तबातबाई· Ghazal· 15 shers· radif: क्या हो

यह ग़ज़ल जीवन की नश्वरता, भविष्य की अनिश्चितता और बेपरवाही या अभिमान की व्यर्थता को रेखांकित करती है। कवि यह संदेश देता है कि दर्द, संवेदना और प्रेम के अभाव में मानव जीवन और हृदय का कोई वास्तविक मूल्य नहीं है।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
अबस है नाज़-ए-इस्तिग़्ना पे कल की क्या ख़बर क्या हो ख़ुदा मालूम ये सामान क्या हो जाए सर क्या हो
अपनी बेपरवाही और बेनियाज़ी पर नाज़ करना व्यर्थ है, क्योंकि कल क्या होगा किसी को नहीं पता। सिर्फ़ ईश्वर ही जानता है कि कल इस साज़ो-सामान और स्वयं इस सिर (यानी ज़िंदगी) का क्या हाल होगा।
2
ये आह-ए-बे-असर क्या हो ये नख़्ल-ए-बे-समर क्या हो न हो जब दर्द ही या-रब तो दिल क्या हो जिगर क्या हो
उस बेअसर आह और बिना फल वाले पेड़ का क्या फायदा? हे ईश्वर, जब सीने में दर्द ही न हो तो दिल और जिगर का क्या मोल है?
3
जहाँ इंसान खो जाता हो ख़ुद फिर उस की महफ़िल में रसाई किस तरह हो दख़्ल क्यूँकर हो गुज़र क्या हो
जहाँ इंसान ख़ुद को ही खो बैठता हो, उस महफ़िल में किसी की पहुँच कैसे हो सकती है, वहाँ प्रवेश कैसे मिले और गुज़रना कैसे मुमकिन हो सकता है।
4
न पूछूँगा मैं ये भी जाम में है ज़हर या अमृत तुम्हारे हाथ से अंदेशा-ए-नफ़-ओ-ज़रर क्या हो
मैं यह भी नहीं पूछूँगा कि प्याले में ज़हर है या अमृत, क्योंकि जब वह आपके हाथों से मिल रहा हो, तो मुझे नफ़े या नुकसान की क्या परवाह हो सकती है।
5
मुरव्वत से हो बेगाना वफ़ा से दूर हो कोसों ये सच है नाज़नीं हो ख़ूबसूरत हो मगर क्या हो
तुम शराफ़त व लिहाज़ से अनजान हो और वफ़ा से कोसों दूर हो; यह सच है कि तुम नाज़ुक और ख़ूबसूरत हो, मगर ऐसे होने का क्या फ़ायदा?
6
शगूफ़े देख कर मुट्ठी में ज़र को मुस्कुराते हैं कि जब उम्र इस क़दर कोताह रखते हैं तो ज़र क्या हो
कलियाँ अपनी मुट्ठी में सोना देखकर मुस्कुराती हैं कि जब उनकी ज़िंदगी इतनी छोटी है, तो फिर इस दौलत का क्या मोल या फ़ायदा।
7
रहा करती है ये हैरत मुझे ज़ुहद-ए-रियाई पर ख़ुदा से जो नहीं डरता उसे बंदे का डर क्या हो
मुझे दिखावे की परहेज़गारी और इबादत पर हमेशा अचरज होता है; जो इंसान ख़ुदा से ही नहीं डरता, उसे किसी इंसान का क्या डर होगा।
8
कहा मैं ने कि 'नज़्म'-ए-मुब्तला मरता है हसरत में कहा उस ने अगर मर जाए तो मेरा ज़रर क्या हो
मैंने उससे कहा कि प्यार में मुब्तिला नज़्म हसरत में मरा जा रहा है, तो उसने जवाब दिया कि अगर वह मर भी जाए तो इसमें मेरा क्या नुकसान होगा?
9
कहा मैं ने कि है सोज़-ए-जिगर और उफ़ नहीं करता कहा इस की इजाज़त ही नहीं फिर नौहागर क्या हो
मैंने कहा कि मेरा दिल दर्द से जल रहा है फिर भी मैं उफ़ तक नहीं करता, तो महबूब ने जवाब दिया कि तुम्हें तो इसकी भी इजाज़त नहीं है, फिर तुम मातम करने वाले कैसे कहला सकते हो?
10
कहा मैं ने कि दे उस को इजाज़त आह करने की कहा उस ने भड़क उठ्ठे अगर सोज़-ए-जिगर क्या हो
मैंने उससे कहा कि उसे आह भरने की इजाज़त दे दो, तो उसने कहा कि अगर उसके दिल की जलन भड़क उठी तो क्या होगा?
11
कहा मैं ने कि आँसू आँख का लेकिन नहीं थमता कहा आँखें कोई तलवों से मल डाले अगर क्या हो
मैंने कहा कि मेरी आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं लेते, तो उसने जवाब दिया कि अगर कोई तुम्हारी इन आँखों को अपने पैरों के तलवों से कुचल या रगड़ दे तो क्या हो?
12
कहा मैं ने क़दम भर पर है वो सूरत दिखा आओ कहा मुँह फेर कर इतना किसी को दर्द-ए-सर क्या हो
मैंने कहा कि वह बस एक क़दम की दूरी पर है, जाकर उसे अपना चेहरा दिखा आओ; इस पर उसने मुँह फेर कर कहा कि कोई इतनी सिरदर्दी क्यों मोल ले।
13
कहा मैं ने असर मुतलक़ नहीं क्या संग-दिल है तू कहा जब दिल हो पत्थर का तो पत्थर पर असर क्या हो
मैंने कहा कि तुम पर कोई असर नहीं होता, तुम कितने पत्थर-दिल हो; इस पर उसने जवाब दिया कि जब दिल ही पत्थर का हो, तो पत्थर पर किसी चीज़ का क्या असर हो सकता है।
14
कहा मैं ने जो मर जाए तो क्या हो सोच तू दिल में कहा ना-आक़िबत-अँदेश ने कुछ सोच कर क्या हो
मैंने कहा कि ज़रा दिल में सोचो कि अगर कोई मर जाए तो क्या होगा, इस पर उस बेपरवाह इंसान ने कहा कि आख़िर कुछ सोचने से क्या हासिल होगा।
15
कहा मैं ने ख़बर भी है कि दी जाँ उस ने घुट घट कर कहा मर जाए चुपके से तो फिर मुझ को ख़बर क्या हो
मैंने उससे पूछा कि क्या तुम्हें ख़बर भी है कि उसने घुट-घुट कर अपनी जान दे दी; उसने जवाब दिया कि अगर कोई इतनी ख़ामोशी से मर जाए, तो भला मुझे कैसे ख़बर होगी?
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