जहाँ इंसान खो जाता हो ख़ुद फिर उस की महफ़िल में रसाई किस तरह हो दख़्ल क्यूँकर हो गुज़र क्या हो

“Where one loses one's own self within that gathering, how could there be access, how entrance, what passage could there be?”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

जहाँ इंसान ख़ुद को ही खो बैठता हो, उस महफ़िल में किसी की पहुँच कैसे हो सकती है, वहाँ प्रवेश कैसे मिले और गुज़रना कैसे मुमकिन हो सकता है।

विस्तार

इस शेर में शायर महबूब या किसी ऐसी अज़ीम महफ़िल की बात कर रहे हैं, जहाँ क़दम रखते ही इंसान अपनी सुध-बुध और वजूद खो बैठता है। जब किसी माहौल में पहुँचते ही ख़ुद की पहचान ही मिट जाती हो, तो फिर कोई वहाँ अपनी पहुँच, असर या गुज़र की उम्मीद कैसे रख सकता है? यह शेर उस बेबसी और असीम आकर्षण को बयां करता है, जहाँ इश्क़ की शिद्दत में इंसान की 'मैं' पूरी तरह फ़ना हो जाती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

ऑडियो

पाठUnavailable
हिंदी अर्थUnavailable
अंग्रेज़ी अर्थUnavailable
हिंदी विस्तारUnavailable
अंग्रेज़ी विस्तारUnavailable
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.