ग़ज़ल
हैं बा'द मिरे मर्ग के आसार से अब तक
हैं बा'द मिरे मर्ग के आसार से अब तक
यह ग़ज़ल जीवन में प्रेम और वफ़ा की उम्मीदों पर केंद्रित है। शायर कहता है कि मृत्यु के बाद भी, और जीवन के हर कोने में, प्रेम की कोई आस बाकी है। वह अपने दिल के ज़ख्मों और बेवफ़ाई के अनुभवों को व्यक्त करता है, जिसमें उसे किसी से भी सच्चा साथ नहीं मिला।
गीत सुनें
1
हैं बा'द मिरे मर्ग के आसार से अब तक
सूखा नहीं लोहू दर-ओ-दीवार से अब तक
मेरे मरने के बाद से, किसी भी तरह के जीवन के संकेत नहीं मिले हैं, और न ही दरवाज़े या दीवारों पर खून सूख पाया है।
2
रंगीनी-ए-इश्क़ इस के मिले पर हुई मा'लूम
सोहबत न हुई थी किसी खूँ-ख़्वार से अब तक
इस के रंगीनी-ए-इश्क़ का मिलना पता चला, क्योंकि अब तक किसी खूँ-ख़्वार व्यक्ति के साथ साथ नहीं रहा।
3
कब से मुतहम्मिल है जफ़ाओं का दिल-ए-ज़ार
ज़िन्हार-वफ़ा हो न सकी यार से अब तक
यह दिल-ए-ज़ार कब तक बेवफ़ाई के दर्द सहता रहेगा? अब तक तो वफ़ा का वादा यार से पूरा नहीं हो सका।
4
अबरू ही की जुम्बिश ने ये सुथराओ किए हैं
मारा नहीं उन ने कोई तलवार से अब तक
अबरू की हल्की-फुल्की हरकतों ने ये नाज़ुक चीज़ें बनाई हैं, और आज तक उन पर किसी तलवार ने वार नहीं किया है।
5
वा'दा भी क़यामत का भला कोई है वा'दा
पर दिल नहीं ख़ाली ग़म-ए-दीदार से अब तक
क्या कोई ऐसा वादा है जो क़यामत से बेहतर हो, ऐ वादा? पर मेरा दिल खाली नहीं है, यह अब तक दीदार के ग़म से भरा है।
6
मुद्दत हुई घुट घुट के हमें शहर में मरते
वाक़िफ़ न हुआ कोई उस असरार से अब तक
बहुत समय हो गया है कि हम शहर में घुटे-घुटे मर रहे हैं; अभी तक किसी को उस रहस्यमय प्रभाव का पता नहीं चला।
7
बरसों हुए दिल-सोख़्ता बुलबुल को मूए लेक
इक दूद सा उठता है चमन-ज़ार से अब तक
बरसों से दिल टूटने का दर्द सहता बुलबुल, अब चमन के जादू से एक मीठी धारा बनकर उठ रहा है।
8
क्या जानिए होते हैं सुख़न लुत्फ़ के कैसे
पूछा नहीं उन ने तो हमें प्यार से अब तक
किसी के वा言ों का आनंद कैसा होता है, यह तो पता नहीं; उन्होंने अब तक कभी भी प्यार से हमें नहीं पूछा।
9
उस बाग़ में अग़्लब है कि सरज़द न हुआ हो
यूँ नाला-कसो मुर्ग़-ए-गिरफ़्तार से अब तक
उस बाग में एक रहस्य छिपा है जो प्रकट नहीं हुआ है, और न ही पिंजरे में बंद मुर्गे को अब तक शांति मिली है।
10
ख़त आए पे भी दिन है सियह तुम से हमारा
जाता नहीं अंधेर ये सरकार से अब तक
ख़त आने पर भी दिन श्याम (काला) है तुम से हमारा। यह अँधेरा सरकार से अब तक नहीं जाता।
11
निकला था कहीं वो गुल-ए-नाज़ुक शब-ए-मह में
सो कोफ़्त नहीं जाती है रुख़्सार से अब तक
कहीं वह नाज़ुक फूल चाँदनी रात में खिला था, और तब से वह लाली उसके गाल से नहीं गई है।
12
देखा था कहीं साया तिरे क़द का चमन में
हैं 'मीर'-जी आवारा-परी दार से अब तक
क्या मैंने कहीं तुम्हारे कद की छाया एक बगीचे में देखी थी? मीर जी, आवारा-परी अब तक यहीं है।
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