कब से मुतहम्मिल है जफ़ाओं का दिल-ए-ज़ार — मीर तक़ी मीर

कब से मुतहम्मिल है जफ़ाओं का दिल-ए-ज़ार ज़िन्हार-वफ़ा हो न सकी यार से अब तक

“How long must this sorrowful heart bear the cruelty;\The promise of fidelity could not be kept by the beloved until now.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

यह दिल-ए-ज़ार कब तक बेवफ़ाई के दर्द सहता रहेगा? अब तक तो वफ़ा का वादा यार से पूरा नहीं हो सका।

विस्तार

यह शेर उस दर्द को बयां करता है, जो बार-बार धोखे और बेवफाई से गुज़रने के बाद आता है। शायर पूछते हैं कि यह दिल कब तक इन ज़फ़ाओं को सहता रहेगा। और दूसरी पंक्ति में एक कड़वा सच है— कि तमाम दर्द के बावजूद, महबूब कभी वफ़ा करना ही नहीं आया। यह टूटे हुए दिल की गहरी शिकायत है।

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