निकला था कहीं वो गुल-ए-नाज़ुक शब-ए-मह में — मीर तक़ी मीर

निकला था कहीं वो गुल-ए-नाज़ुक शब-ए-मह में सो कोफ़्त नहीं जाती है रुख़्सार से अब तक

“He once emerged, a delicate flower in the night of the moon, And since then, the blush has not left her cheek.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

कहीं वह नाज़ुक फूल चाँदनी रात में खिला था, और तब से वह लाली उसके गाल से नहीं गई है।

विस्तार

यह शेर बहुत ख़ूबसूरत है, जो नज़रों को मोह लेने वाली खूबसूरती की बात करता है। शायर कह रहे हैं कि महबूब की नाज़ुक अदा, जैसे चाँदनी रात में खिला कोई गुल, इतनी जादुई है कि उसका नशा आज भी, उसके गालों से उतरता नहीं है। यह अमर खूबसूरती को सलाम है।

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