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ग़ज़ल

भला होगा कुछ इक अहवाल उस से या बुरा होगा

भला होगा कुछ इक अहवाल उस से या बुरा होगा

यह ग़ज़ल जीवन की अनिश्चितता और किसी के व्यवहार के परिणामों पर विचार करती है। इसमें कवि सवाल करता है कि उस व्यक्ति के साथ क्या होगा, चाहे वह अच्छा हो या बुरा। यह मनुष्य के हृदय के दर्द और विभिन्न स्थितियों में जीवन की अस्थिरता को दर्शाता है।

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1
भला होगा कुछ इक अहवाल उस से या बुरा होगा मआल अपना तिरे ग़म में ख़ुदा जाने कि क्या होगा
उसके कारण अच्छा होगा या बुरा, मेरा क्या होगा यह तो खुदा ही जाने।
2
तफ़ह्हुस फ़ाएदा नासेह तदारुक तुझ से क्या होगा वही पावेगा मेरा दर्द-ए-दिल जिस का लगा होगा
तफ़हूहस फ़ायदे, नसीहत तदारुक, तुझ से क्या होगा? मेरा दिल का दर्द वही पाएगा, जिसका लगा होगा।
3
कसो को शौक़ यारब बेश उस से और क्या होगा क़लम हाथ गई होगी तो सौ सौ ख़त लिखा होगा
प्रियतम को आपके अलावा और क्या शौक हो सकता है? यदि कलम हाथ में होती, तो सौ-सौ ख़त लिखे जाते।
4
दुकानें हुस्न की आगे तिरे तख़्ता हुई होंगी जो तू बाज़ार में होगा तो यूसुफ़ कब बिका होगा
हुस्न की दुकानें तुम्हारे आगे भी होंगी, और तुम्हारा तख़्ता बिक गया; यदि तुम बाज़ार में होते, तो यूसुफ़ कब बिका होता।
5
मईशत हम फ़क़ीरों की सी इख़वान-ए-द-ज़माँ से कर कोई गाली भी दे तो कह भला भाई भला होगा
हम फ़क़ीरों की तरह हैं कि अगर इस ज़माने के भाई-बहनों से हमें कोई गाली भी मिल जाए, तो भी यह कह देना कि यह अच्छा होगा, भाई, यह अच्छा होगा।
6
ख़याल उस बेवफ़ा का हम-नशीं इतना नहीं अच्छा गुमाँ रखते थे हम भी ये कि हम से आश्ना होगा
उस बेवफ़ा की याद हम-नशीं नहीं है, पर हम भी सोचते थे कि वह हमसे आत्मीय होगा।
7
क़यामत कर के अब ता'बीर जिस को करती है ख़िल्क़त वो उस कूचे में इक आशोब सा शायद हुआ होगा
वह शायर जो क़यामत के दिन ता'बीर कर सकता है, शायद उस गली में एक नाला बन गया होगा।
8
अजब क्या है हलाक इश्क़ में फ़र्हाद-ओ-मजनूँ के मोहब्बत रोग है कोई कि कम उस से जिया होगा
अजीब है फ़र्हाद और मजनूँ का इश्क़, यह मोहब्बत का रोग है, कि इसके बिना जीवन अधूरा रह जाएगा।
9
हो क्यूँ ग़ैरत-ए-गुल-ज़ार वो कूचा ख़ुदा जाने लहू इस ख़ाक पर किन किन अज़ीज़ों का गिरा होगा
हे फूल वाले बगीचे के रास्ते, जिसे ख़ुदा जानता है, यह क्यों इज़्ज़त का स्रोत नहीं है? इस मिट्टी पर कितने प्यारे लोगों का खून गिरा होगा।
10
बहुत हम-साए इस गुलशन के ज़ंजीरी रहा हूँ मैं कभू तुम ने भी मेरा शोर नालों का सुना होगा
मैं इस बाग़ के गुलशन में तुम्हारी तरह एक क़ैदी पंछी सा रहा हूँ; शायद तुमने भी नाले का मेरा शोर सुना होगा।
11
नहीं जुज़ अर्श जागा राह में लेने को दम उस के क़फ़स से तन के मुर्ग़-ए-रूह मेरा जब रहा होगा
किसी के प्राण लेने के लिए सिंहासन रास्ते में नहीं जागा, जब मेरा रूह का क़ैदी पंछी अपने पिंजरे में रहा होगा।
12
कहीं हैं 'मीर' को मारा गया शब उस के कूचे में कहीं वहशत में शायद बैठे बैठे उठ गया होगा
कहीं है 'मीर' को मारा गया शब उस के कूचे में, कहीं वहशत में शायद बैठे बैठे उठ गया होगा।
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