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नहीं जुज़ अर्श जागा राह में लेने को दम उस के क़फ़स से तन के मुर्ग़-ए-रूह मेरा जब रहा होगा

Neither the throne awoke on the path to take the breath from him, When my soul's caged bird was still within its cage.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

किसी के प्राण लेने के लिए सिंहासन रास्ते में नहीं जागा, जब मेरा रूह का क़ैदी पंछी अपने पिंजरे में रहा होगा।

विस्तार

ये शेर एक बहुत गहरे दर्द को बयान करता है। शायर कह रहे हैं कि जब मेरी रूह का मुर्ग़़ा (पक्षी) क़ैद में था, मेरा दर्द इतना गहरा था कि न तो जन्नत का कोई कोना, न ही कोई बड़ा सिंहासन.... उसे पता था। यह दर्द उस वक़्त का है जब इंसान को लगता है कि उसका ग़म इतना निजी है कि दुनिया की कोई बड़ी चीज़ उसे महसूस नहीं कर सकती।

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