ग़ज़ल
रमक़ एक जान-ए-वबाल है कोई दम जो है तो अज़ाब है
रमक़ एक जान-ए-वबाल है कोई दम जो है तो अज़ाब है
यह ग़ज़ल किसी ऐसे व्यक्ति का वर्णन करती है जो अपने अस्तित्व के कारण एक प्रकार का 'अज़ाब' या चुनौती है। इसमें वक्ता अपने दिल और अपने शब्दों की तीव्रता का वर्णन करता है, जो प्रेम और पीड़ा से भरा है। यह कविता बताती है कि वक्ता की बातें या उपस्थिति लोगों के लिए एक जटिल और कभी-कभी कष्टदायक अनुभव होती है।
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1
रमक़ एक जान-ए-वबाल है कोई दम जो है तो अज़ाब है
दिल-ए-दाग़ गश्ता कबाब है जिगर गुदाख़ता आब है
रमक़ एक जान-ए-वबाल है कोई दम जो है तो अज़ाब है। दिल-ए-दाग़ गश्ता कबाब है जिगर गुदाख़ता आब है।
2
मिरी ख़ल्क़ महव-ए-कलाम सब मुझे छोड़ते हैं ख़मोश कब
मिरा हर्फ़ रश्क-ए-किताब है मरी बात लिखने का बाब है
मेरी भीड़ महब-ए-कलाम से मुझे खामोश कर देती है, कब तक इंतज़ार करूँ? मेरा शब्द एक ईर्ष्यालु किताब है; मेरी बात लिखना मेरा नियत किया हुआ रास्ता है।
3
जो वो लिखता कुछ भी तो नामा-बर कोई रहती मुँह में तिरे निहाँ
तिरी ख़ामुशी से ये निकले है कि जवाब ख़त का जवाब है
अगर तुम कुछ भी लिखोगे, तो मेरा नाम तुम्हारे ज़ुबान पर रहेगा, तुम्हारे मन के कोने में; तुम्हारी खामोशी से यह निकला है कि यह एक जवाब के जवाब में दिया गया जवाब है।
4
रहे हाल दिल का जो एक सा तो रुजूअ' करते कहीं भला
सो तू ये कभू हमा दाग़ है कभू नीम-सोज़ कबाब है
दिल की हालत अगर एक जैसी रहे, तो यह कहाँ मुड़कर देखेगा? ऐ तू, यह कभी हमारा दाग़ है और कभी नीम की जलन से बना कबाब है।
5
कहेंगे कहो तुम्हें लोग क्या यही आरसी यही तुम सदा
न कसो की तुम को है टक हया न हमारे मुँह से हिजाब है
लोग कहेंगे कि तुम क्या हो, यही आरसी, यही तुम सदा। न कसो कि तुम को है टक हया, न हमारे मुँह से हिजाब है।
6
चलो मय-कदे में बसर करें कि रही है कुछ बरकत वहीं
लब-ए-नाँतोवाँ का कबाब है दम-ए-आबवाँ का शराब है
चलो मय-कदे में बसर करें कि रही है कुछ बरकत वहीं। लब-ए-नाँतोवाँ का कबाब है, दम-ए-आबवाँ का शराब है। इसका अर्थ है कि हमें प्रेम के धाम में समय बिताना चाहिए क्योंकि वहाँ अभी भी कुछ कृपा बची है। प्रिय के होंठ कबाब जैसे हैं और माता-पिता का सार (या शराब) है।
7
नहीं खुलतीं आँखें तुम्हारी टक कि मआल पर भी नज़र करो
ये जो वहम की सी नुमूद है उसे ख़ूब देखो तो ख़्वाब है
तुम्हारी आँखें नहीं खुलतीं, तो एक बार मआल पर भी नज़र करो। यह जो भ्रम जैसी नज़ारा है, उसे ख़ूब देखो, तो यह ख़्वाब है।
8
गए वक़्त आते हैं हाथ कब हुए हैं गँवा के ख़राब सब
तुझे करना होवे सो कर तू अब कि ये उम्र बरक़-ए-शित्ताब है
समय बीत जाते हैं, हाथ बेकार में खो गए; सब खराब है। अब जो तुम्हें करना है, वह करो, क्योंकि यह उम्र चमकते शीत के आसमान जैसी है।
9
कभू लुत्फ़ से न सुख़न क्या कभू बात कह न लगा लिया
यही लहज़ा लहज़ा ख़िताब है वही लम्हा लम्हा इ'ताब है
कभी-कभी वाणी के आनंद में क्या है, कभी क्या बात कह न दिया, कभी कोई शब्द बोल दिया, कभी कोई बात नहीं कही; यह लहजा, यह संबोधन, हर पल का इनाम है।
10
तू जहाँ के बहर-ए-अमीक़ में सर पर हुआ न बुलंद कर
कि ये पंज-रोज़ा जो बूद है कसो मौज-ए-पुर का हबाब है
तू जहाँ की गहरी लहरों में अपना सिर न ऊँचा कर, क्योंकि यह जो बस एक दिन का उपवास है, वह किसी शक्तिशाली लहर के झाग जैसा है।
11
रखो आरज़ू मय-ए-ख़ाम की करो गुफ़्तुगू ख़त-ए-जाम की
कि सियाह कारों से हश्र में न हिसाब है न किताब है
मय-ए-ख़ाम (wine-like intoxication) के लिए अपनी चाहत बनाए रखना, और जाम के ख़त (cup's letter) पर बातें करना; क्योंकि काले बालों वाले लोगों के जमावड़े में न हिसाब है और न किताब।
12
मिरा शोर सुन के जो लोगों ने किया पूछना तू कहे है क्या
जिसे 'मीर' कहते हैं साहिबो ये वही तो ख़ाना-ख़राब है
जो लोगों ने मेरा शोर सुनकर मुझसे पूछा कि मैं क्या कहती हूँ, आप कहिए। साहिबों, जिसे आप 'मीर' कहते हैं, वह तो वही पुराना ख़ाना-ख़राब है।
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