गए वक़्त आते हैं हाथ कब हुए हैं गँवा के ख़राब सब — मीर तक़ी मीर

गए वक़्त आते हैं हाथ कब हुए हैं गँवा के ख़राब सब तुझे करना होवे सो कर तू अब कि ये उम्र बरक़-ए-शित्ताब है

“Times arrive, and hands are lost in waste; what can be done now that you must do, when this life is like the shining winter sky?”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

समय बीत जाते हैं, हाथ बेकार में खो गए; सब खराब है। अब जो तुम्हें करना है, वह करो, क्योंकि यह उम्र चमकते शीत के आसमान जैसी है।

विस्तार

यह शेर समय के गुज़र जाने और पछतावे के गहरे एहसास को बयां करता है। शायर कहते हैं कि वक़्त तो ऐसे गुज़र जाता है कि हमें पता ही नहीं चलता कि हमने क्या खो दिया। इसलिए, ये बात याद रखनी चाहिए कि जीवन कोई ठहरा हुआ मंज़र नहीं है। यह तो एक चमकती, खूबसूरत सुबह की तरह है, जिसे हमें पल-पल जीकर जीना चाहिए और कोई काम टालना नहीं चाहिए।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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