ग़ज़ल

ये बात बात में क्या नाज़ुकी निकलती है

یہ بات بات میں کیا نازکی نکلتی ہے
दाग़ देहलवी· Ghazal· 17 shers· radif: निकलती है

इस ग़ज़ल में महबूब की नाज़ुकी, अदाओं और दबी हुई मुस्कान की ख़ूबसूरती को बयाँ किया गया है। साथ ही, आशिक़ के दिल के दर्द और विरह की तड़प को दर्शाते हुए प्यार के गहरे अहसास को संजीदगी से पेश किया गया है।

Source: rekhta · HI

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
ये बात बात में क्या नाज़ुकी निकलती है दबी दबी तिरे लब से हँसी निकलती है
तुम्हारी हर बात में कितनी नज़ाकत झलकती है, और तुम्हारे होंठों से दबी-दबी हँसी निकलती है।
2
ठहर ठहर के जला दिल को एक बार न फूँक कि इस में बू-ए-मोहब्बत अभी निकलती है
दिल को धीरे-धीरे जलाओ और इसे एक ही बार में पूरी तरह मत फूँक दो, क्योंकि अभी भी इसमें से मोहब्बत की खुशबू आ रही है।
3
बजाए शिकवा भी देता हूँ मैं दुआ उस को मिरी ज़बाँ से करूँ क्या यही निकलती है
शिकायत करने के बदले भी मैं उसे दुआ ही देता हूँ; मैं क्या करूँ, मेरी ज़बान से बस यही निकलती है।
4
ख़ुशी में हम ने ये शोख़ी कभी नहीं देखी दम-ए-इताब जो रंगत तिरी निकलती है
हमने ख़ुशी के मौक़े पर कभी वह चमक और शोख़ी नहीं देखी, जो ग़ुस्से की हालत में तुम्हारे चेहरे पर निखर आती है।
5
हज़ार बार जो माँगा करो तो क्या हासिल दुआ वही है जो दिल से कभी निकलती है
हज़ार बार माँगने से भी कुछ हासिल नहीं होता, क्योंकि असली दुआ वही होती है जो सच्चे दिल से निकलती है।
6
अदा से तेरी मगर खिंच रहीं हैं तलवारें निगह निगह से छुरी पर छुरी निकलती है
तुम्हारी दिलकश अदाओं के कारण तलवारें खिंच रही हैं और तुम्हारी हर एक नज़र से लगातार छुरियाँ चल रही हैं।
7
मुहीत-ए-इश्क़ में है क्या उमीद ओ बीम मुझे कि डूब डूब के कश्ती मिरी निकलती है
इश्क़ के अथाह समंदर में मुझे उम्मीद और डर की कोई परवाह नहीं है, क्योंकि मेरी कश्ती बार-बार डूब कर भी किनारे निकल आती है।
8
झलक रही है सर-ए-शाख़-ए-मिज़ा ख़ून की बूँद शजर में पहले समर से कली निकलती है
पलकों रूपी टहनी की नोक पर ख़ून की एक बूँद चमक रही है, ठीक वैसे ही जैसे किसी पेड़ पर फल लगने से पहले कली निकलती है।
9
शब-ए-फ़िराक़ जो खोले हैं हम ने ज़ख़्म-ए-जिगर ये इंतिज़ार है कब चाँदनी निकलती है
जुदाई की इस रात में हमने अपने जिगर के ज़ख़्म खोल दिए हैं, अब बस यह इंतज़ार है कि चाँदनी कब निकलती है।
10
समझ तो लीजिए कहने तो दीजिए मतलब बयाँ से पहले ही मुझ पर छुरी निकलती है
कम से कम मेरी बात समझ तो लीजिए और मुझे अपनी बात कहने तो दीजिए; मेरे कुछ बयान करने से पहले ही मुझ पर छुरी निकल आती है।
11
ये दिल की आग है या दिल के नूर का है ज़ुहूर नफ़स नफ़स में मिरे रौशनी निकलती है
यह दिल की आग है या दिल के नूर का प्रकटीकरण, कि मेरी हर सांस से रोशनी निकल रही है।
12
कहा जो मैं ने कि मर जाऊँगा तो कहते हैं हमारे ज़ाइचे में ज़िंदगी निकलती है
जब मैंने कहा कि मैं मर जाऊँगा, तो उन्होंने जवाब दिया कि हमारी जन्मपत्री (ज़ाइचे) में तो ज़िंदगी लिखी हुई है।
13
समझने वाले समझते हैं पेच की तक़रीर कि कुछ न कुछ तिरी बातों में फ़ी निकलती है
समझदार लोग बातों के घुमाव-फिराव को भली-भाँति समझ लेते हैं, क्योंकि तुम्हारी बातों में हमेशा कोई न कोई पेंच या नुक्स निकल ही आता है।
14
दम-ए-अख़ीर तसव्वुर है किस परी-वश का कि मेरी रूह भी बन कर परी निकलती है
आख़िरी वक़्त में किस परी-जैसी महबूबा का ध्यान आ रहा है कि मेरी रूह भी परी बनकर शरीर से निकल रही है?
15
सनम-कदे में भी है हुस्न इक ख़ुदाई का कि जो निकलती है सूरत परी निकलती है
बुतख़ाने में भी ईश्वरीय सौंदर्य की एक झलक मौजूद है, क्योंकि वहाँ से जो भी चेहरा सामने आता है वह किसी परी जैसा ही दिखाई देता है।
16
मिरे निकाले न निकलेगी आरज़ू मेरी जो तुम निकालना चाहो अभी निकलती है
मेरे निकालने की कोशिश से मेरी तमन्ना दिल से नहीं निकलेगी, लेकिन अगर आप इसे निकालना चाहें तो यह अभी निकल जाएगी।
17
ग़म-ए-फ़िराक़ में हो 'दाग़' इस क़दर बेताब ज़रा से रंज में जाँ आप की निकलती है
ऐ दाग़, आप जुदाई के ग़म में इस क़दर बेचैन हैं कि ज़रा से भी रंज या दुख पर आपकी जान निकलने लगती है।
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