समझने वाले समझते हैं पेच की तक़रीर — दाग़ देहलवी

समझने वाले समझते हैं पेच की तक़रीर कि कुछ न कुछ तिरी बातों में फ़ी निकलती है

“Those who discern can well perceive the twists of subtle speech, for in your words some hidden catch is always found to leach.”

— दाग़ देहलवी

अर्थ

समझदार लोग बातों के घुमाव-फिराव को भली-भाँति समझ लेते हैं, क्योंकि तुम्हारी बातों में हमेशा कोई न कोई पेंच या नुक्स निकल ही आता है।

विस्तार

शायर यहाँ किसी की घुमावदार और चालाकी भरी बातों पर बड़ी नज़ाकत से चुटकी ले रहा है। 'पेच की तक़रीर' यानी उलझे हुए लफ़्ज़ों का जाल, जिसमें कोई न कोई खोट या छुपा हुआ मक़सद यानी 'फ़ी' ज़रूर छिपा होता है। यह शेर हमें समझाता है कि समझदार लोगों के सामने लफ़्ज़ों की बाज़ीगरी नहीं चलती, क्योंकि वो मीठी बातों के पीछे छिपे असली इरादे को पल भर में पहचान लेते हैं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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