ठहर ठहर के जला दिल को एक बार न फूँक — दाग़ देहलवी

ठहर ठहर के जला दिल को एक बार न फूँक कि इस में बू-ए-मोहब्बत अभी निकलती है

“Burn this heart by slow degrees, do not scorch it all at once; for the fragrance of love still rises from within.”

— दाग़ देहलवी

अर्थ

दिल को धीरे-धीरे जलाओ और इसे एक ही बार में पूरी तरह मत फूँक दो, क्योंकि अभी भी इसमें से मोहब्बत की खुशबू आ रही है।

विस्तार

शायर यहाँ अपने दिल की तुलना किसी कीमती लोबान या अगरबत्ती से कर रहा है और दर्द से गुज़ारिश करता है कि वह उसे एक झटके में राख न करे, बल्कि धीरे-धीरे सुलगने दे। इस धीमी आँच में जलते हुए दिल से अब भी सच्ची मोहब्बत की महक उठ रही है, जो इस तड़प को भी पाकीज़ा बना देती है। यह बर्बादी में भी इश्क का जश्न मनाने जैसा है, जहाँ आशिक को अपने दर्द से ज्यादा इस बात की परवाह है कि मुहब्बत की खुशबू कहीं खो न जाए।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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