झलक रही है सर-ए-शाख़-ए-मिज़ा ख़ून की बूँद — दाग़ देहलवी
“Upon the eyelash-branch's tip a drop of blood now gleams; for on a tree, before the fruit, a bud must first appear.”
अर्थ
पलकों रूपी टहनी की नोक पर ख़ून की एक बूँद चमक रही है, ठीक वैसे ही जैसे किसी पेड़ पर फल लगने से पहले कली निकलती है।
विस्तार
शायर ने यहाँ पलकों को दरख़्त की शाख़ और उस पर अटकी ख़ून के आँसू की बूँद को एक लाल कली की तरह देखा है। जैसे किसी पेड़ पर फल आने से पहले कली खिलती है, वैसे ही इश्क़ और ग़म के इस सफ़र में ख़ून का यह आँसू महज़ एक शुरुआत है। यह शेर बड़ी नफ़ासत से बयां करता है कि अभी तो दिल के ज़ख़्म खिलना शुरू ही हुए हैं, दर्द का मुकम्मल अंजाम तो आगे आना बाक़ी है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
ऑडियो
Free — just your email. You'll come right back here.
No comments yet. Be the first.
