ग़ज़ल

वो ज़माना नज़र नहीं आता

وہ زمانہ نظر نہیں آتا
दाग़ देहलवी· Ghazal· 11 shers· radif: नज़र नहीं आता

यह ग़ज़ल बीते हुए सुनहरे दौर की याद और महबूब के विरह में उपजे गहरे दर्द को व्यक्त करती है। इसमें ज़िंदगी के धीरे-धीरे ख़त्म होने और प्रियतम के न आने की बेबसी व तड़प को मार्मिक रूप से दर्शाया गया है।

Source: rekhta · HI

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
वो ज़माना नज़र नहीं आता कुछ ठिकाना नज़र नहीं आता
वह पुराना ज़माना अब कहीं दिखाई नहीं देता और न ही किसी ठिकाने या सहारे का कोई अता-पता नज़र आता है।
2
जान जाती दिखाई देती है उन का आना नज़र नहीं आता
मुझे अपनी जान जाती हुई तो दिखाई दे रही है, लेकिन उनके आने का कोई आसार नज़र नहीं आता।
3
इश्क़ दर-पर्दा फूँकता है आग ये जलाना नज़र नहीं आता
इश्क़ पर्दे के पीछे छुपकर आग भड़काता है, और उसका यह जलाना किसी को दिखाई नहीं देता।
4
इक ज़माना मिरी नज़र में रहा इक ज़माना नज़र नहीं आता
एक दौर मेरी आँखों के सामने रहा, और अब एक लंबा अरसा बीत गया है कि कुछ नज़र ही नहीं आता।
5
दिल ने इस बज़्म में बिठा तो दिया उठ के जाना नज़र नहीं आता
दिल ने मुझे इस महफ़िल में लाकर बैठा तो दिया है, लेकिन अब यहाँ से उठकर जाने की कोई राह नज़र नहीं आ रही है।
6
रहिए मुश्ताक़-ए-जल्वा-ए-दीदार हम ने माना नज़र नहीं आता
दीदार की झलक पाने के लिए हमेशा उत्सुक और लालायित रहिए, भले ही यह सच हो कि वह सामने दिखाई नहीं देता।
7
ले चलो मुझ को राह-रवान-ए-अदम याँ ठिकाना नज़र नहीं आता
हे अदम (परलोक/मृत्यु) की राह पर चलने वाले मुसाफ़िरो, मुझे भी अपने साथ ले चलो, क्योंकि यहाँ इस दुनिया में मुझे कोई ठिकाना या आसरा नज़र नहीं आता।
8
दिल पे बैठा कहाँ से तीर-ए-निगाह ये निशाना नज़र नहीं आता
निगाह का तीर दिल पर कहाँ से आकर लगा? यह निशाना तो कहीं नज़र ही नहीं आता।
9
तुम मिलाओगे ख़ाक में हम को दिल मिलाना नज़र नहीं आता
तुम तो मुझे मिट्टी में मिलाकर बर्बाद ही करोगे, क्योंकि तुम्हारे दिल का मुझसे मिलना तो कहीं नज़र नहीं आता।
10
आप ही देखते हैं हम को तो दिल का आना नज़र नहीं आता
आप सिर्फ मुझे ही देखते रहते हैं, लेकिन आपको यह दिखाई नहीं देता कि मेरा दिल आप पर आ गया है।
11
दिल-ए-पुर-आरज़ू लुटा ऐ 'दाग़' वो ख़ज़ाना नज़र नहीं आता
ऐ दाग़, ख़्वाहिशों से भरा दिल लुट गया, लेकिन अब वह ख़ज़ाना कहीं दिखाई नहीं देता।
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