ग़ज़ल

जब कभी दरिया में होते साया-अफ़गन आप हैं

جب کبھی دریا میں ہوتے سایہ افگن آپ ہیں
बहादुर शाह ज़फ़र· Ghazal· 16 shers· radif: आप हैं

यह ग़ज़ल महबूब के मनमोहक सौंदर्य और उसके जादुई प्रभाव के साथ-साथ प्रेमी के असहनीय विरह-दर्द को उजागर करती है। जहाँ महबूब का अक्स दरिया तक को जगमगा देता है, वहीं आशिक़ का सीना ग़म के ऐसे कांटों से छलनी है जिसका कोई इलाज मुमकिन नहीं।

Source: rekhta · HI

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लिपि व अर्थ
1
जब कभी दरिया में होते साया-अफ़गन आप हैं फ़िल्स-ए-माही को बताते माह-ए-रौशन आप हैं
2
सीते हैं सोज़न से चाक-ए-सीना क्या ऐ चारासाज़ ख़ार-ए-ग़म सीने में अपने मिस्ल-ए-सोज़न आप हैं
3
प्यार से कर के हमाइल ग़ैर की गर्दन में हाथ मारते तेग़-ए-सितम से मुझ को गर्दन आप हैं
4
खींच कर आँखों में अपनी सुर्मा-ए-दुम्बाला-दार करते पैदा सेहर से नर्गिस में सोसन आप हैं
5
देख कर सहरा में मुझ को पहले घबराया था क़ैस फिर जो पहचाना तो बोला हज़रत-ए-मन आप हैं
6
जी धड़कता है कहीं तार-ए-रग-ए-गुल चुभ न जाए सेज पर फूलों की करते क़स्द-ए-ख़ुफ़तन आप हैं
7
क्या मज़ा है तेग़-ए-क़ातिल में कि अक्सर सैद-ए-इश्क़ आन कर उस पर रगड़ते अपनी गर्दन आप हैं
8
मुझ से तुम क्या पूछते हो कैसे हैं हम क्या कहें जी ही जाने है कि जैसे मुश्फ़िक़-ए-मन आप हैं
9
पुर-ग़ुरूर ओ पुर-तकब्बुर पुर-जफ़ा ओ पुर-सितम पुर-फ़रेब ओ पुर-दग़ा पुर-मक्र ओ पुर-फ़न आप हैं
10
ज़ुल्म-पेशा ज़ु़ल्म-शेवा ज़ु़ल्म-रान ओ ज़ुल्म-दोस्त दुश्मन-ए-दिल दुश्मन-ए-जाँ दुश्मन-ए-तन आप हैं
11
यक्का-ताज़ ओ नेज़ा-बाज़ ओ अरबदा-जू तुंद-ख़ू तेग़-ज़न दश्ना-गुज़ार ओ नावक-अफ़गन आप हैं
12
तस्मा-कश तराज़ ओ ग़ारत-गर ताराज-साज़ काफ़िर यग़माई ओ क़ज़्ज़ाक़ रहज़न आप हैं
13
फ़ित्ना-जू बेदाद-गर सफ़्फ़ाक ओ अज़्लम कीना-वर गर्म-जंग ओ गर्म-क़त्ल ओ गर्म-कुश्तन आप हैं
14
बद-मिज़ाज ओ बद-दिमाग़ व बद-शिआ'र ओ बद-सुलूक बद-तरीक़ ओ बद-ज़बाँ बद-अहद ओ बद-ज़न आप हैं
15
बे-मुरव्वत बेवफ़ा ना-मेहरबाँ ना-आश्ना मेरे क़ातिल मेरे हासिद मेरे दुश्मन आप हैं
16
ऐ 'ज़फ़र' क्या पा-ए-क़ातिल के है बोसे की हवस यूँ जो बिस्मिल हो के सरगर्म-ए-तपीदन आप हैं
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