غزل

आ जाएँ हम नज़र जो कोई दम बहुत है याँ

आ जाएँ हम नज़र जो कोई दम बहुत है याँ
میر تقی میر· Ghazal· 12 shers

یہ غزل جدائی کے شدید احساسات اور محبوب کی آمد کے شوق کو بیان کرتی ہے۔ شاعر محبوب سے التجا کرتا ہے کہ وہ نظرِ بزم آ جائے، کیونکہ جدائی کا دکھ سہنا بہت مشکل ہے۔ یہ غزل محبت میں فراق اور انتظار کے گہرے جذبات کو پیش کرتی ہے۔

نغمہ سنیں
رسم الخط
1
आ जाएँ हम नज़र जो कोई दम बहुत है याँ मोहलत हमें बिसान-ए-शरर कम बहुत है याँ
آ جائیں ہم نظر جو کوئی دم بہت ہے یاں مہلت ہمیں بسان شرر کم بہت ہے یاں
अगर हम यहाँ बस एक पल के लिए भी नज़र आ जाएँ तो बहुत है; यह मोहलत कि हमें बहुत कम है, जैसे एक चिंगारी के जीवनकाल में होती है।
2
यक लहज़ा सीना-कोबी से फ़ुर्सत हमें नहीं यानी कि दिल के जाने का मातम बहुत है याँ
یک لحظہ سینہ کوبی سے فرصت ہمیں نہیں یعنی کہ دل کے جانے کا ماتم بہت ہے یاں
شاعر کا مطلب ہے کہ اسے غم سے سینہ زنی کرنے کا ایک لمحہ بھی میسر نہیں، یعنی یہاں دل کے جانے کا غم بہت شدید ہے۔
3
हासिल है क्या सिवाए तराई के दहर में उठ आसमाँ तले से कि शबनम बहुत है याँ
حاصل ہے کیا سواے ترائی کے دہر میں اٹھ آسماں تلے سے کہ شبنم بہت ہے یاں
شاعر پوچھتا ہے کہ اس دنیا میں تराई के नमी के अलावा और क्या हासिल है? और कहता है कि आसमाँ के नीचे से उठो, क्योंकि यहाँ ओस (यानी गम) बहुत है।
4
माइल-ब-ग़ैर होना तुझ अबरू का ऐब है थी ज़ोर ये कमाँ वले ख़म-चम बहुत है याँ
مائل بہ غیر ہونا تجھ ابرو کا عیب ہے تھی زور یہ کماں ولے خم چم بہت ہے یاں
तेरा महबूब होना तुझ अबरू का ऐब है, जो मीलों से अलग हो। यह कमान वाली शक्ति तो थी, पर यहाँ बहुत सारे नखरे हैं।
5
हम रह-रवान-ए-राह-ए-फ़ना देर रह चुके वक़्फ़ा बिसान-ए-सुब्ह कोई दम बहुत है याँ
ہم رہروان راہ فنا دیر رہ چکے وقفہ بسان صبح کوئی دم بہت ہے یاں
ہم فنا کے راستے پر سفر کرنے والے ہیں اور بہت دیر ہو چکی ہے۔ ہمارے لیے، صبح کے وقت کا ایک لمحہ کافی ہے۔
6
इस बुत-कदे में मअ'नी का किस से करें सवाल आदम नहीं है सूरत-ए-आदम बहुत है याँ
اس بت کدے میں معنی کا کس سے کریں سوال آدم نہیں ہے صورت آدم بہت ہے یاں
इस मूर्ति-भरे ठिकाने में, किसी से अर्थ का सवाल करना उचित नहीं। यहाँ आदम की सूरत वाले बहुत हैं, मगर असली आदम कहीं नहीं है।
7
आलम में लोग मिलने की गों अब नहीं रहे हर-चंद ऐसा वैसा तो आलम बहुत है याँ
عالم میں لوگ ملنے کی گوں اب نہیں رہے ہر چند ایسا ویسا تو عالم بہت ہے یاں
شاعر کا مطلب ہے کہ آج کل دنیا میں ایسے لوگ نہیں ملتے جن سے ملنے کے لائق ہوں، کیونکہ یہ دنیا ہر طرح کے مناظر سے بھری ہوئی ہے۔
8
वैसा चमन से सादा निकलता नहीं कोई रंगीनी एक और ख़म-ओ-चम बहुत है याँ
ویسا چمن سے سادہ نکلتا نہیں کوئی رنگینی ایک اور خم و چم بہت ہے یاں
कोई भी इस दुनिया के बाग से वैसा सादा नहीं निकलता जैसा वह आया था। यहाँ बहुत सारे रंग और नज़ाकतें हैं जो इंसान को बदल देती हैं।
9
एजाज़-ए-ईसवी से नहीं बहस इश्क़ में तेरी ही बात जान मुजस्सम बहुत है याँ
اعجاز عیسوی سے نہیں بحث عشق میں تیری ہی بات جان مجسم بہت ہے یاں
इश्क़ के रंग में ईसा मसीह के चमत्कार की चर्चा करना ज़रूरी नहीं है। बस आपकी बातों से ही किसी बेजान जिस्म में जान आ जाती है।
10
मेरे हलाक करने का ग़म है अबस तुम्हें तुम शाद ज़िंदगानी करो ग़म बहुत है याँ
میرے ہلاک کرنے کا غم ہے عبث تمہیں تم شاد زندگانی کرو غم بہت ہے یاں
میرے ہلاکت کرنے کا غم ابس تمہیں، تم شاد زندگی گزارو، یہاں غم بہت ہے
11
दिल मत लगा रुख़-ए-अरक़-आलूद यार से आईने को उठा कि ज़मीं नम बहुत है याँ
دل مت لگا رخ عرق آلود یار سے آئینے کو اٹھا کہ زمیں نم بہت ہے یاں
شاعر کہتا ہے کہ اس نشے میں ڈوبے محبوب کے چہرے سے دل نہ لگانا، کیونکہ آئینہ اٹھا دیا گیا ہے اور یہ جگہ بہت نم ہے۔
12
शायद कि काम सुब्ह तक अपना खिंचे न 'मीर' अहवाल आज शाम से दरहम बहुत है याँ
شاید کہ کام صبح تک اپنا کھنچے نہ میرؔ احوال آج شام سے درہم بہت ہے یاں
शायद मैं सुबह तक जीवित न रह पाऊँ, मीर; आज शाम से ही मेरी हालत बहुत नाज़ुक और बिगड़ी हुई है।
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