ग़ज़ल
मुझ को समझो यादगार-ए-रफ़्तगान-ए-लखनऊ
مجھ کو سمجھو یادگار رفتگان لکھنؤ
इस ग़ज़ल में शायर स्वयं को लखनऊ की खोई हुई तहज़ीब और गुज़र चुके लोगों की यादगार के रूप में प्रस्तुत करता है। गहरी उदासी और दर्द के साथ, यह रचना लखनऊ के पतन और उसकी समृद्ध साहित्यिक विरासत के बिखरने का मार्मिक विलाप करती है।
Source: rekhta · HI
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1
मुझ को समझो यादगार-ए-रफ़्तगान-ए-लखनऊ
हूँ क़द-ए-आदम ग़ुबार-ए-कारवान-ए-लखनऊ
2
ख़ून-ए-हसरत कह रहा है दास्तान-ए-लखनऊ
रह गया है अब यही रंगीं-बयान-ए-लखनऊ
3
गोश-ए-इबरत से सुने कोई मिरी फ़रियाद है
बुलबुल-ए-ख़ूनीं नवा-ए-बोस्तान-ए-लखनऊ
4
मेरे हर आँसू में इक आईना-ए-तस्वीर है
मेरे हर नाले में है तर्ज़-ए-फ़ुग़ान-ए-लखनऊ
5
ढूँढता है अब किसे ले कर चराग़-ए-आफ़्ताब
क्यूँ मिटाया ऐ फ़लक तू ने निशान-ए-लखनऊ
6
लखनऊ जिन से इबारत थी हुए वो नापदीद
है निशान-ए-लखनऊ बाक़ी न शान-ए-लखनऊ
7
अब नज़र आता नहीं वो मजमा-ए-अहल-ए-कमाल
खा गए उन को ज़मीन-ओ-आसमान-ए-लखनऊ
8
पहले था अहल-ए-ज़बाँ का दौर अब गर्दिश में हैं
चाहिए थी तेग़-ए-उर्दू को फ़सान-ए-लखनऊ
9
मर्सिया-गो कितने यकता-ए-ज़माना थे यहाँ
कोई तो इतनों में होता नौहा-ख़्वान-ए-लखनऊ
10
ये ग़ुबार-ए-ना-तावाँ ख़ाकिस्तर-ए-परवाना है
ख़ानदान अपना था शम्-ए-दूदमान-ए-लखनऊ
11
चलता था जब घुटनियों अपने यहाँ तिफ़्ल-ए-रज़ीअ'
सज्दा करते थे उसे गर्दन-कुशान-ए-लखनऊ
12
अहद-ए-पीराना-सरी में क्यूँ न शीरीं हो सुख़न
बचपने में मैं ने चूसी है ज़बान-ए-लखनऊ
13
गुलशन-ए-फ़िरदौस पर क्या नाज़ है रिज़वाँ तुझे
पूछ उस के दिल से जो है रुत्बा-दान-ए-लखनऊ
14
बू-ए-उन्स आती है 'हैदर' ख़ाक-ए-मटिया-बुर्ज से
जम्अ' हैं इक जा वतन-आवारगान-ए-लखनऊ
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