पहले था अहल-ए-ज़बाँ का दौर अब गर्दिश में हैं चाहिए थी तेग़-ए-उर्दू को फ़सान-ए-लखनऊ

“Once was the era of the masters of speech, now fallen on adverse days; the sword of Urdu had truly needed the whetstone of Lucknow.”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

पहले भाषा के जानकारों का दौर था मगर अब वे बुरे वक्त के फेर में हैं; उर्दू की तलवार को धार देने के लिए लखनऊ की सान की ज़रूरत थी।

विस्तार

शायर यहाँ बड़े अफ़सोस के साथ उस दौर को याद कर रहे हैं जब भाषा के पारखियों और उस्तादों की कद्र थी, मगर आज हालात गर्दिश में हैं। उन्होंने उर्दू को एक शानदार तलवार (तेग़) और लखनऊ को उसे तेज़ करने वाली सान (फ़सान) कहा है, जिसने इस ज़बान को असली नफ़ासत और धार दी। यह शेर लखनऊ की तहज़ीब के ढलने और उर्दू की खोती हुई नज़ाकत पर एक गहरा और जज़्बाती नोस्टैल्जिया है।

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