अहद-ए-पीराना-सरी में क्यूँ न शीरीं हो सुख़न बचपने में मैं ने चूसी है ज़बान-ए-लखनऊ

“Why should my speech not be sweet in the twilight of old age? In childhood, after all, I suckled upon the tongue of Lucknow.”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

बुढ़ापे के ज़माने में मेरी बातें या शायरी मीठी क्यों न हों, आख़िर बचपन में मैंने लखनऊ की ज़बान का रस चूसा है।

विस्तार

शायर यहाँ लखनऊ की नफ़ासत और उसकी मीठी ज़बान पर नाज़ करते हुए कहते हैं कि बुढ़ापे के इस पड़ाव पर भी उनकी शायरी और बातों में मिठास क्यों न हो! बचपन में उन्होंने लखनऊ की ज़बान को गोया माँ के दूध की तरह अपने अंदर समेटा था। यह शेर यह गहरा एहसास दिलाता है कि बचपन में जज़्ब की गई तहज़ीब और अदब उम्र ढलने पर भी इंसान के लफ़्ज़ों में चाशनी बनकर घुली रहती है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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