ये ग़ुबार-ए-ना-तावाँ ख़ाकिस्तर-ए-परवाना है ख़ानदान अपना था शम्-ए-दूदमान-ए-लखनऊ

“This frail drift of dust is but the ash of a fallen moth; our lineage was once the radiant candle of the house of Lucknow.”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

यह कमज़ोर धूल दरअसल परवाने की राख है, जबकि हमारा ख़ानदान कभी लखनऊ के प्रतिष्ठित घराने की शमा हुआ करता था।

विस्तार

इस शेर में शायर अपनी मौजूदा बेबसी और फ़क़ीरी को एक जले हुए परवाने की बिखरी राख बता रहा है, जो अब धूल बनकर उड़ रही है। मगर इस सादगी और ख़ाकसारी के पीछे एक शानदार इतिहास की गूँज है—वह याद दिलाता है कि कभी उसका ख़ानदान लखनऊ के तहज़ीबी घराने की वह रौशन शमा था जिससे पूरी महफ़िल जगमगाती थी। यह शेर वक़्त के बेरहम फेर और एक उजड़े हुए सुनहरे दौर के दर्द को बेहद नफ़ासत से बयां करता है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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