ढूँढता है अब किसे ले कर चराग़-ए-आफ़्ताब क्यूँ मिटाया ऐ फ़लक तू ने निशान-ए-लखनऊ

“Holding aloft the lamp of the sun, whom do you search for now? Why did you erase, O heavens, every trace of Lucknow?”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

हे आसमान, तूने लखनऊ का नाम-ओ-निशान क्यों मिटा दिया? अब सूरज को चिराग बनाकर तू किसे ढूँढ रहा है?

विस्तार

इस शेर में शायर एक बेहद ख़ूबसूरत और दर्दनाक मंज़र पेश करता है, जहाँ आसमान सूरज को एक छोटे चराग़ की तरह हाथ में लिए कुछ ढूँढ रहा है। विडंबना यह है कि जिस लखनवी तहज़ीब, नफ़ासत और रौनक़ को वक़्त की बेरहमी ने खुद मिटा दिया, अब वह उसी के निशाँ तलाश रहा है। यह उजड़े हुए लखनऊ के उस सुनहरे दौर का गहरा मातम है, जिसकी भरपाई दुनिया की कोई भी रौशनी नहीं कर सकती।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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