अब नज़र आता नहीं वो मजमा-ए-अहल-ए-कमाल खा गए उन को ज़मीन-ओ-आसमान-ए-लखनऊ

“No longer seen is that gathering of masters of rare renown; the earth and sky of Lucknow have swallowed them all down.”

— नज़्म तबातबाई
अर्थ

अब हुनरमंद और क़ाबिल लोगों की वह महफ़िल कहीं नज़र नहीं आती; लखनऊ की ज़मीन और आसमान उन सबको निगल गए हैं।

विस्तार

यह शेर लखनऊ के उस सुनहरे दौर के खो जाने का दर्द बयां करता है, जब यह शहर हुनरमंदों, शायरों और अदीबों की महफ़िलों से गुलज़ार रहता था। शायर अफ़सोस जताते हुए कहता है कि वक़्त की गर्दिश और यहाँ की ज़मीन-ओ-आसमान ने उन लाजवाब फ़नकारों को अपने अंदर समेट कर ख़ामोश कर दिया। यह सिर्फ़ लोगों के रुख़सत होने का अफ़सोस नहीं, बल्कि एक पूरी तहज़ीब और अदबी रौनक़ के मिट जाने की गहरी उदासी है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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