“How many peerless elegists once flourished in this land, / Yet among them all, was there none to sing a dirge for Lucknow?”
यहाँ ज़माने भर में बेमिसाल कितने ही मर्सिया लिखने वाले मौजूद थे, काश उन सब में कोई तो ऐसा होता जो उजड़ते हुए लखनऊ का मातम करता।
यह शेर लखनऊ की बर्बाद होती तहज़ीब और उसके खोए हुए जलाल का एक बेहद दर्दनाक शिकवा है। लखनऊ मीर अनीस और मिर्ज़ा दबीर जैसे बेमिसाल मर्सिया-गो शायरों का शहर रहा, जिन्होंने ग़म को शायरी की मेराज पर पहुँचा दिया। लेकिन शायर अफ़सोस के साथ कहता है कि जब खुद लखनऊ उजड़ रहा था, तो उसकी तबाही का मातम मनाने और उस पर नौहा पढ़ने वाला कोई न बचा। यहाँ लखनऊ को खुद एक शहीद की तरह पेश किया गया है, जिसकी मौत पर रोने वाला कोई अपना ही न रहा।
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