ग़ज़ल

फिर उस से तरह कुछ जो दा'वे की सी डाली है

फिर उस से तरह कुछ जो दा'वे की सी डाली है

कविता कहती है कि अब किसी से वैसी चीज़ की उम्मीद न करें जो केवल दिखावे या दावे की तरह हो। जीवन में कुछ सच्चा और नया पाने के लिए, हमें एक तरह की तैयारी या व्यवस्था करनी पड़ी है, लेकिन यह व्यवस्था शायद उतनी संतोषजनक न हो। अंत में, यह भाव व्यक्त होता है कि बाहरी प्रशंसा या आलिंगन से ज़्यादा ज़रूरी, एक खाली और सच्ची भावना है।

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शेर दर शेर अर्थ

लिपि व अर्थ
1
फिर उस से तरह कुछ जो दा'वे की सी डाली है क्या ताज़ा कोई गुल ने अब शाख़ निकाली है
फिर उस से तरह कुछ जो दा'वे की सी डाली है, क्या ताज़ा कोई गुल ने अब शाख़ निकाली है। इसका अर्थ है कि किसी ने जो पहले दावे किए थे, क्या कोई नया फूल अब कोई नई शाखा लेकर आया है।
2
सच पूछो तो कब हैगा उस का सा दहन ग़ुंचा तस्कीं के लिए हम ने इक बात बना ली है
सच कहूँ तो कब होगा उस फूल जैसा दमकता हुआ कली? तस्वीर के लिए हमने एक वादा कर लिया है।
3
देही को न कुछ पूछो इक भरत का है गड़वा तरकीब से क्या कहिए साँचे में की ढाली है
शरीर के बारे में कुछ मत पूछो, यह तो भरत का एक डिज़ाइन है; जब किसी आकृति को साँचे में ढाल दिया गया हो, तो उसके बारे में क्या कहा जा सकता है।
4
हम क़द्द-ए-ख़मीदा से आग़ोश हुए सारे पर फ़ाएदा तुझ से तो आग़ोश वो ख़ाली है
हम क़द्द-ए-ख़मीदा से तो आलिंगन किए, पर तुझसे मिलने वाला आलिंगन तो व्यर्थ है।
5
इज़्ज़त की कोई सूरत दिखलाई नहीं देती चुप रहिए तो चश्मक है कुछ कहिए तो गाली है
इस बात का अर्थ है कि सम्मान का कोई प्रमाण दिखाई नहीं देता; यदि आप चुप रहते हैं तो आपको देखा जाता है, और यदि आप बोलते हैं तो यह गाली के समान होता है।
6
दो-गाम के चलने में पामाल हुआ आलम कुछ सारी ख़ुदाई से वो चाल निराली है
दो गाँवों में चलने से पूरा माहौल मदहोश हो गया, / कुछ दैवीय कृपा से उसकी चाल बहुत अनोखी है।
7
हैगी तो दो साला पर है दुख़्तर-ए-रज़ आफ़त क्या पीर-ए-मुग़ाँ ने भी इक छोकरी पाली है
यदि उसका होना निश्चित है, तो प्रेमी का यह दुःख एक विपत्ति है; क्या मद के स्वामी ने भी एक लड़की पाल रखी है।
8
ख़ूँ-रेज़ी में हम सों की जो ख़ाक बराबर हैं कब सर तो फ़रो लाया हिम्मत तिरी आली है
ख़ूँ-रेज़ी में हम सों की जो ख़ाक बराबर हैं, कब सर तो फ़रो लाया हिम्मत तिरी आली है। इसका अर्थ है कि रक्त-रंजित धरती में हम लोग तुम्हारे लिए धूल के समान हैं; हे प्यारी बहन, तुम कब वह साहस लेकर आओगी।
9
जब सर चढ़े हों ऐसे तब इश्क़ करें सो भी जूँ तूँ ये बला सर से फ़रहाद ने टाली है
जब किसी के प्रेम में ऐसा जोश हो, तब प्रेम करने वाले औरों को छोड़ दो। यह मुसीबत/बला मैंने अपने सिर से टाली है, ऐ फ़राज़।
10
इन मुग़्बचों में ज़ाहिद फिर सर ज़दा मत आना मिंदील तिरी अब के हम ने तो बचा ली है
इन धोखेबाज़ों में साधु बनकर फिर सिर पर मत आना, क्योंकि मैंने तुम्हारा रुमाल पहले ही बचा लिया है।
11
क्या 'मीर' तू रोता है पामाली-ए-दिल ही को उन लौंडों ने तो दिल्ली सब सर पे उठा ली है
क्या 'मीर' तू केवल अपने मन की शरारत के लिए रोता है, जबकि उन लड़कों ने तो दिल्ली को पूरी तरह से हिला दिया है।
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