ग़ज़ल
मुस्तूजिब-ए-ज़ुलम-ओ-सितम-ओ-जौर-ओ-जफ़ा हूँ
मुस्तूजिब-ए-ज़ुलम-ओ-सितम-ओ-जौर-ओ-जफ़ा हूँ
यह ग़ज़ल एक ऐसे व्यक्ति का वर्णन करती है जो अत्याचार, उत्पीड़न, अन्याय और बेवफ़ाई का पात्र है। शायर कहता है कि वह प्रेम की हर तरह की परीक्षा से गुज़रता है, लेकिन साथ ही वह वफ़ा की गर्मी भी है। वह दुनिया में खिलने वाला नहीं है, बल्कि एक मुरझाया हुआ कली जैसा है जो अपने महबूब के रास्ते में आँखों से चला है।
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1
मुस्तूजिब-ए-ज़ुलम-ओ-सितम-ओ-जौर-ओ-जफ़ा हूँ
हर-चंद कि जलता हूँ पे सरगर्म-ए-वफ़ा हूँ
मैं अन्याय, अत्याचार, क्रूरता, और बेवफाई का सामना करने वाला हूँ, फिर भी हर पल मैं भक्ति की गर्मी से जलता हूँ।
2
आते हैं मुझे ख़ूब से दोनों हुनर-ए-इश्क़
रोने के तईं आँधी हूँ कुढ़ने को बला हूँ
मुझे दोनों हुनर-ए-इश्क़ बहुत अच्छे से आते हैं। मैं रोने के लिए आँधी हूँ और झेलने के लिए एक बला हूँ।
3
इस गुलशन-ए-दुनिया में शगुफ़्ता न हुआ मैं
हूँ ग़ुंचा-ए-अफ़्सुर्दा कि मर्दूद-ए-सबा हूँ
इस दुनिया के गुलशन में मैं खिला नहीं, बल्कि मैं एक मुरझाया हुआ कली हूँ जो बस बिखरती हुई बहार की हवा है।
4
हम-चश्म है हर आबला-ए-पा का मिरा अश्क
अज़-बस कि तिरी राह में आँखों से चला हूँ
मेरे आँसू हर प्रेमी के लिए एकमात्र जल हैं, क्योंकि मैं तुम्हारे लिए आँखों से चला हूँ।
5
आया कोई भी तरह मिरे चीन की होगी
आज़ुर्दा हूँ जीने से मैं मरने से ख़फ़ा हूँ
कोई भी तरह कोई मेरे चीन का होगा। मैं जीने और मरने दोनों से बेपरवाह हूँ।
6
दामन न झटक हाथ से मेरे कि सितमगर
हूँ ख़ाक-ए-सर-ए-राह कोई दम में हुआ हूँ
दामन न झटक हाथ से मेरे, कि सितमगर। मैं तो बस राह पर पड़ी हुई धूल हूँ, जो पल भर के लिए हूँ।
7
दिल ख़्वाह जला अब तो मुझे ऐ शब-ए-हिज्राँ
मैं सोख़्ता भी मुंतज़िर-ए-रोज़-ए-जज़ा हूँ
हे दिल, जो तड़प से जला है, अब तो मुझे ऐ शब-ए-हिज्राँ, मैं सोख़्ता भी मुंतज़िर-ए-रोज़-ए-जज़ा हूँ।
8
गो ताक़त-ओ-आराम-ओ-ख़ोर-ओ-ख़्वाब गए सब
बारे ये ग़नीमत है कि जीता तो रहा हूँ
हे, शक्ति, आराम, पोषण और सपने, सब चले गए; यह एक सौभाग्य है कि मैं जीवित तो रहा हूँ।
9
इतना ही मुझे इल्म है कुछ मैं हूँ बहर-चीज़
मा'लूम नहीं ख़ूब मुझे भी कि मैं क्या हूँ
मुझे इतना ही ज्ञान है कि मैं कौन हूँ, पर यह बात भी मुझे ठीक से नहीं पता कि मैं क्या हूँ।
10
बेहतर है ग़रज़ ख़ामुशी ही कहने से याराँ
मत पूछो कुछ अहवाल कि मर मर के जिया हूँ
यारों, ज़रूरत को चुप ही रहने देना बेहतर है। मेरी हालत के बारे में मत पूछना, क्योंकि मैं बहुत कष्ट सहकर जीया हूँ।
11
तब गर्म-ए-सुख़न कहने लगा हूँ मैं कि इक उम्र
जूँ शम्अ' सर-ए-शाम से ता-सुब्ह जला हूँ
तब गर्म-ए-सुख़न कहने लगा हूँ मैं कि इक उम्र
जूँ शम्अ' सर-ए-शाम से ता-सुब्ह जला हूँ।
अर्थात, मैं कह रहा हूँ कि यह मीठी बातें (गर्म-ए-सुख़न) इसलिए हैं क्योंकि मैंने एक जीवनकाल (इक उम्र) के लिए शाम के समय से लेकर सुबह के समय तक एक मोमबत्ती जलाई है।
12
सीना तो किया फ़ज़्ल-ए-इलाही से सभी चाक
है वक़्त-ए-दुआ 'मीर' कि अब दिल को लगा हूँ
मेरा सीना तो ईश्वर की कृपा से सभी प्रकार से शुद्ध हो गया है; अब दुआ का समय है, मीर, कि मैंने अपना दिल पा लिया है।
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