तब गर्म-ए-सुख़न कहने लगा हूँ मैं कि इक उम्र जूँ शम्अ' सर-ए-शाम से ता-सुब्ह जला हूँ

“I say that this heat of speech is that I have lit a candle From the dusk of evening till the dawn of morning.”

— मीर तक़ी मीर
अर्थ

तब गर्म-ए-सुख़न कहने लगा हूँ मैं कि इक उम्र जूँ शम्अ' सर-ए-शाम से ता-सुब्ह जला हूँ। अर्थात, मैं कह रहा हूँ कि यह मीठी बातें (गर्म-ए-सुख़न) इसलिए हैं क्योंकि मैंने एक जीवनकाल (इक उम्र) के लिए शाम के समय से लेकर सुबह के समय तक एक मोमबत्ती जलाई है।

विस्तार

यह शेर बहुत ही गहरे सब्र और लगातार बने रहने की बात करता है। शायर कह रहे हैं कि उन्होंने अपने शब्दों की गर्मी के बारे में बात की, मतलब बात करने का प्रयास भी बहुत थका देने वाला था। लेकिन असली गहराई उस उपमा में है: शाम से सुबह तक मोमबत्ती जलाए रखना। यह एक ऐसे अटूट समर्पण या संघर्ष को दिखाता है जो सबसे अंधेरी रात में भी जारी रहता है।

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