इस गुलशन-ए-दुनिया में शगुफ़्ता न हुआ मैं हूँ ग़ुंचा-ए-अफ़्सुर्दा कि मर्दूद-ए-सबा हूँ

“In this garden of the world, I did not blossom, I am a wilted bud, a scattered breath of the spring breeze.”

— मीर तक़ी मीर
अर्थ

इस दुनिया के गुलशन में मैं खिला नहीं, बल्कि मैं एक मुरझाया हुआ कली हूँ जो बस बिखरती हुई बहार की हवा है।

विस्तार

मिर्ज़ा तक़ी मीर ने यहाँ अपूर्णता के दर्द को बड़ी गहराई से बयां किया है। वो कहते हैं कि इस दुनिया के गुलशन में मैं कभी खिला नहीं। मैं तो एक मुरझाया हुआ कली हूँ, जो हवा की तरह बिखर गई है। यह उन लोगों का एहसास है जो जीवन की रौनक में भी अपनी जगह या पहचान नहीं पा पाते। एक बहुत ही मार्मिक और गहरा चित्रण है!

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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