ग़ज़ल
आप का ए'तिबार कौन करे
آپ کا اعتبار کون کرے
यह ग़ज़ल महबूब के वादों की अविश्वसनीयता और निरंतर प्रतीक्षा से उपजी बेबसी व थकावट को दर्शाती है। इसमें शायर का शिकवा और दर्द झलकता है, फिर भी वह महबूब को शर्मिंदा न करने के ख़याल से अपनी शिकायत को गरिमा के साथ व्यक्त करता है।
Source: rekhta · HI
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1
आप का ए'तिबार कौन करे
रोज़ का इंतिज़ार कौन करे
आप पर कौन भरोसा करे और रोज़-रोज़ आपका इंतज़ार कौन करता रहे?
2
ज़िक्र-ए-मेहर-ओ-वफ़ा तो हम करते
पर तुम्हें शर्मसार कौन करे
हम प्यार और वफ़ादारी का ज़िक्र ज़रूर करते, मगर ऐसा करके आपको शर्मिंदा कौन करना चाहता।
3
हो जो उस चश्म-ए-मस्त से बे-ख़ुद
फिर उसे होशियार कौन करे
जो व्यक्ति महबूब की उस मतवाली आँख से बेसुध या मदहोश हो जाए, उसे फिर दोबारा होश में कौन ला सकता है?
4
तुम तो हो जान इक ज़माने की
जान तुम पर निसार कौन करे
आप तो पूरे ज़माने की जान हैं, भला आप पर अपनी जान कौन न्योछावर करे?
5
आफ़त-ए-रोज़गार जब तुम हो
शिकवा-ए-रोज़गार कौन करे
जब आप खुद ही इस ज़माने की सबसे बड़ी मुसीबत हैं, तो फिर कोई ज़माने या तक़दीर से क्या शिकायत करे।
6
अपनी तस्बीह रहने दे ज़ाहिद
दाना दाना शुमार कौन करे
हे तपस्वी, अपनी माला को रहने दो; भला एक-एक दाना बैठकर कौन गिनेगा?
7
हिज्र में ज़हर खा के मर जाऊँ
मौत का इंतिज़ार कौन करे
जुदाई के दर्द में ज़हर खाकर मर जाना बेहतर है, भला मौत के आने का इंतज़ार कौन करे?
8
आँख है तर्क-ए-ज़ुल्फ़ है सय्याद
देखें दिल का शिकार कौन करे
माशूक़ की आँख एक लड़ाकू तुर्क है और ज़ुल्फ़ एक शिकारी है; अब देखना यह है कि दिल का शिकार इन दोनों में से कौन करता है।
9
वा'दा करते नहीं ये कहते हैं
तुझ को उम्मीद-वार कौन करे
वे कोई वादा नहीं करते, बल्कि यह कहते हैं कि भला तुम्हें उम्मीद में कौन रखे।
10
'दाग़' की शक्ल देख कर बोले
ऐसी सूरत को प्यार कौन करे
दाग़ का चेहरा देखकर वे बोले कि ऐसी सूरत से भला कौन प्यार करेगा?
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