“When you yourself are the affliction of the age, who is there left to complain against fate?”
जब आप खुद ही इस ज़माने की सबसे बड़ी मुसीबत हैं, तो फिर कोई ज़माने या तक़दीर से क्या शिकायत करे।
अक्सर इंसान अपनी तमाम परेशानियों और दर्दों का ज़िम्मेदार इस ज़माने या किस्मत को ठहराता है। लेकिन शायर यहाँ बड़ी शोख़ी और तड़प के साथ महबूब से कहता है कि जब इस दुनिया की सबसे बड़ी आफ़त और कयामत तुम ही हो, तो फिर ज़माने से क्या शिकवा करना! यह महबूब की बेरुख़ी पर एक गहरा तंज़ भी है और यह प्यारा सा इज़हार भी कि आशिक़ के लिए दुनिया का सारा दर्द उसके महबूब की एक नज़र के आगे छोटा पड़ जाता है।
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