ग़ज़ल
जब कि पहलू में हमारे बुत-ए-ख़ुद-काम न हो
جب کہ پہلو میں ہمارے بت خود کام نہ ہو
यह ग़ज़ल महबूब के विरह में लगातार बहते आँसुओं और दिल की गहरी तड़प को दर्शाती है। अपने खोए हुए सुकून से व्याकुल होकर शायर उस बेपरवाह दिलबर के प्रति अपने दर्द और रोष को व्यक्त करता है, जिसने उसके दिल का सारा चैन छीन लिया।
Source: rekhta · HI
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1
जब कि पहलू में हमारे बुत-ए-ख़ुद-काम न हो
गिर्ये से शाम-ओ-सहर क्यूँ कि हमें काम न हो
2
ले गया दिल का जो आराम हमारे या रब
उस दिल-आराम को मुतलक़ कभी आराम न हो
3
जिस को समझे लब-ए-पाँ-ख़ुर्दा वो मालिदा-मिसी
मर्दुमाँ देखियो फूली वो कहीं शाम न हो
4
आज तशरीफ़ गुलिस्ताँ में वो मय-कश लाया
कफ़-ए-नर्गिस पे धरा क्यूँकि भला जाम न हो
5
कर मुझे क़त्ल वहाँ अब कि न हो कोई जहाँ
ता मिरी जाँ तू कहीं ख़ल्क़ में बदनाम न हो
6
देख कर खोलियो तू काकुल-ए-पेचाँ की गिरह
कि मिरा ताइर-ए-दिल उस के तह-ए-दाम न हो
7
बिन तिरे ऐ बुत-ए-ख़ुद-काम ये दिल को है ख़तर
तेरे आशिक़ का तमाम आह कहीं काम न हो
8
आज हर एक जो यारो नज़र आता है निढाल
अपनी अबरू की वो खींचे हुए समसाम न हो
9
है मिरे शोख़ की बालीदा वो काफ़िर आँखें
जिस के हम चश्म ज़रा नर्गिस-ए-बादाम न हो
10
सुब्ह होती ही नहीं और नहीं कटती रात
रुख़ पे खोले वो कहीं ज़ुल्फ-ए-सियाह-फ़ाम न हो
11
ऐ 'ज़फ़र' चर्ख़ पे ख़ुर्शीद जो यूँ काँपे है
जल्वा-गर आज कहीं यार लब-ए-बाम न हो
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