غزل

عجب اپنا حال ہوتا جو وصال یار ہوتا

عجب اپنا حال ہوتا جو وصال یار ہوتا
داغ دہلوی· Ghazal· 11 shers· radif: होता

یہ غزل وصالِ یار کی پرزور تڑپ اور اس کے پرکیف تصور کو پیش کرتی ہے، جس میں عاشق محبوب پر دل و جان نثار کرنے کے جذبے سے سرشار ہے۔ اس کے ساتھ ہی، سنگدل محبوب کے دل پر اپنا اختیار نہ ہونے کی گہری حسرت اور بے بسی کا درد بھرا بیان ہے۔

Source: rekhta · HI

نغمہ سنیں
ابھی نغمہ نہیں
رسم الخط
1
अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता कभी जान सदक़े होती कभी दिल निसार होता
عجب اپنا حال ہوتا جو وصال یار ہوتا کبھی جان صدقے ہوتی کبھی دل نثار ہوتا
2
कोई फ़ित्ना ता-क़यामत न फिर आश्कार होता तिरे दिल पे काश ज़ालिम मुझे इख़्तियार होता
کوئی فتنہ تا قیامت نہ پھر آشکار ہوتا ترے دل پہ کاش ظالم مجھے اختیار ہوتا
3
जो तुम्हारी तरह तुम से कोई झूटे वादे करता तुम्हीं मुंसिफ़ी से कह दो तुम्हें ए'तिबार होता
جو تمہاری طرح تم سے کوئی جھوٹے وعدے کرتا تمہیں منصفی سے کہہ دو تمہیں اعتبار ہوتا
4
ग़म-ए-इश्क़ में मज़ा था जो उसे समझ के खाते ये वो ज़हर है कि आख़िर मय-ए-ख़ुश-गवार होता
غم عشق میں مزا تھا جو اسے سمجھ کے کھاتے یہ وہ زہر ہے کہ آخر مے خوش گوار ہوتا
5
ये मज़ा था दिल-लगी का कि बराबर आग लगती न तुझे क़रार होता न मुझे क़रार होता
یہ مزہ تھا دل لگی کا کہ برابر آگ لگتی نہ تجھے قرار ہوتا نہ مجھے قرار ہوتا
6
न मज़ा है दुश्मनी में न है लुत्फ़ दोस्ती में कोई ग़ैर ग़ैर होता कोई यार यार होता
نہ مزا ہے دشمنی میں نہ ہے لطف دوستی میں کوئی غیر غیر ہوتا کوئی یار یار ہوتا
7
तिरे वादे पर सितमगर अभी और सब्र करते अगर अपनी ज़िंदगी का हमें ए'तिबार होता
ترے وعدے پر ستم گر ابھی اور صبر کرتے اگر اپنی زندگی کا ہمیں اعتبار ہوتا
8
ये वो दर्द-ए-दिल नहीं है कि हो चारासाज़ कोई अगर एक बार मिटता तो हज़ार बार होता
یہ وہ درد دل نہیں ہے کہ ہو چارہ ساز کوئی اگر ایک بار مٹتا تو ہزار بار ہوتا
9
गए होश तेरे ज़ाहिद जो वो चश्म-ए-मस्त देखी मुझे क्या उलट न देते जो न बादा-ख़्वार होता
گئے ہوش تیرے زاہد جو وہ چشم مست دیکھی مجھے کیا الٹ نہ دیتے جو نہ بادہ خوار ہوتا
10
मुझे मानते सब ऐसा कि अदू भी सज्दे करते दर-ए-यार काबा बनता जो मिरा मज़ार होता
مجھے مانتے سب ایسا کہ عدو بھی سجدے کرتے در یار کعبہ بنتا جو مرا مزار ہوتا
11
तुम्हें नाज़ हो न क्यूँकर कि लिया है 'दाग़' का दिल ये रक़म न हाथ लगती न ये इफ़्तिख़ार होता
تمہیں ناز ہو نہ کیونکر کہ لیا ہے داغؔ کا دل یہ رقم نہ ہاتھ لگتی نہ یہ افتخار ہوتا
Comments · 0

Free — just your email. You'll come right back here.

No comments yet. Be the first.