ग़ज़ल
तिरा लब देख हैवाँ याद आवे
ترا لب دیکھ حیواں یاد آوے
इस ग़ज़ल में शायर अपने महबूब के अनुपम सौंदर्य की शास्त्रीय उपमाओं के ज़रिए प्रशंसा करता है। महबूब के होंठों, चेहरे और नयनों की तुलना आब-ए-हयात, कनान और नर्गिस के फूलों से करते हुए यह रचना मुग्धता और गहरे प्रेम का भाव जगाती है।
Source: rekhta · HI
गीत सुनें
1
तिरा लब देख हैवाँ याद आवे
तिरा मुख देख कनआँ याद आवे
तुम्हारे होंठों को देखकर आब-ए-हयात (अमृत) याद आता है, और तुम्हारा सुंदर चेहरा देखकर कनान की याद आ जाती है।
2
तिरे दो नैन जब देखूँ नज़र भर
मुझे तब नर्गिसिस्ताँ याद आवे
जब मैं तुम्हारी दोनों आँखों को नज़र भरकर देखता हूँ, तब मुझे नरगिस के फूलों का बाग़ याद आ जाता है।
3
तिरी ज़ुल्फ़ाँ की तूलानी कूँ देखे
मुझे लैल-ए-ज़मिस्ताँ याद आवे
तुम्हारी ज़ुल्फ़ों की लंबाई देखकर मुझे सर्दी की लंबी रात याद आ जाती है।
4
तिरे ख़त का ज़मुर्रद-रंग देखे
बहार-ए-सुंबुलिस्ताँ याद आवे
तुम्हारे चेहरे पर उगे नए ख़त (हल्के बालों) का पन्ना जैसा हरा रंग देखकर सुंबुल (एक प्रकार के फूल) के बाग़ की बहार याद आ जाती है।
5
तिरे मुख के चमन के देखने सूँ
मुझे फ़िरदौस-ए-रिज़वाँ याद आवे
तुम्हारे चेहरे के बाग़ को देखने से मुझे रिज़वान का स्वर्ग (फ़िरदौस-ए-रिज़वाँ) याद आ जाता है।
6
तिरी ज़ुल्फ़ाँ में यू मुख जो कि देखे
उसे शम-ए-शबिस्ताँ याद आवे
जो कोई तुम्हारी ज़ुल्फ़ों के बीच तुम्हारा चेहरा देखता है, उसे रात के कमरे में जलती हुई शमा (मोमबत्ती) याद आ जाती है।
7
जो कुइ देखे मिरी अँखियाँ को रोते
उसे अब्र-ए-बहाराँ याद आवे
जो कोई भी मेरी आँखों को रोते हुए देखेगा, उसे बसंत के मौसम के बरसते बादलों की याद आ जाएगी।
8
जो मेरे हाल की गर्दिश कूँ देखे
उसे गिर्दाब-ए-गर्दां याद आवे
जो व्यक्ति मेरी हालत की गर्दिश और उलझनों को देखेगा, उसे घूमता हुआ भंवर याद आ जाएगा।
9
'वली' मेरा जुनूँ जो कुइ कि देखे
उसे कोह ओ बयाबाँ याद आवे
वली कहते हैं कि जो कोई भी मेरे पागलपन या दीवानेपन को देखता है, उसे पहाड़ और वीराने (जंगल) याद आ जाते हैं।
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