तिरे ख़त का ज़मुर्रद-रंग देखे — वली दकनी

तिरे ख़त का ज़मुर्रद-रंग देखे बहार-ए-सुंबुलिस्ताँ याद आवे

“Beholding the emerald hue of the soft down upon your cheek; one recalls the blooming spring of a hyacinth garden.”

— वली दकनी

अर्थ

तुम्हारे चेहरे पर उगे नए ख़त (हल्के बालों) का पन्ना जैसा हरा रंग देखकर सुंबुल (एक प्रकार के फूल) के बाग़ की बहार याद आ जाती है।

विस्तार

इस शेर में शायर महबूब के रुख़्सार पर उभरती हल्की और नर्म सब्ज़ लकीर (ख़त) की बेहद नाज़ुक तारीफ़ कर रहा है। उस हल्के सब्ज़ रंग को शायर ने पन्ने (ज़मुर्रद) जैसा चमकदार बताया है, जिसे देखकर यूँ लगता है जैसे सुम्बुल के फूलों का पूरा बाग़ बहार के मौसम में महक उठा हो। यह महबूब के नए-नए निखरते हुस्न और शबाब की ऐसी दिलकश तस्वीर है, जो सादगी में भी कुदरत की पूरी ताज़गी समेटे हुए है।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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