ग़ज़ल
एहसान ले न हिम्मत-ए-मर्दाना छोड़ कर
احسان لے نہ ہمت مردانہ چھوڑ کر
यह ग़ज़ल स्वाभिमान, आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता का संदेश देती है, जिसमें दूसरों के एहसानों से बचकर अपनी हिम्मत के बल पर जीने की प्रेरणा दी गई है। इसके साथ ही यह जीवन की इस कटु सच्चाई को भी रेखांकित करती है कि विपत्ति और अंत के समय इंसान बिल्कुल अकेला रह जाता है।
Source: rekhta · HI
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1
एहसान ले न हिम्मत-ए-मर्दाना छोड़ कर
रस्ता भी चल तू सब्ज़ा-ए-बेगाना छोड़ कर
अपनी मर्दाना हिम्मत और आत्मसम्मान को छोड़कर किसी का एहसान मत लो; यदि रास्ते पर भी चलना हो, तो किसी पराए की हरियाली से बचकर चलो।
2
मरने के बा'द फिर नहीं कोई शरीक-ए-हाल
जाता है शम-ए-कुश्ता को परवाना छोड़ कर
मृत्यु के बाद कोई भी व्यक्ति साथ निभाने वाला नहीं रहता; यहाँ तक कि परवाना भी बुझी हुई शमा को अकेला छोड़कर चला जाता है।
3
होंटों पे आज तक हैं शब-ए-ऐश के मज़े
साक़ी का लब लिया लब-ए-पैमाना छोड़ कर
उस ऐश की रात का मज़ा आज तक मेरे होंठों पर बना हुआ है, क्योंकि मैंने शराब के प्याले को छोड़कर साक़ी के होंठों को चूम लिया था।
4
अफ़ई नहीं खुली हुई ज़ुल्फ़ों का अक्स है
जाते कहाँ हो आईना ओ शाना छोड़ कर
यह कोई ज़हरीला साँप नहीं बल्कि खुली हुई ज़ुल्फ़ों का अक्स (प्रतिबिंब) है; तुम आईना और कंघी छोड़कर कहाँ भागे जा रहे हो?
5
तूल-ए-अमल पे दिल न लगाना कि अहल-ए-बज़्म
जाएँगे ना-तमाम ये अफ़्साना छोड़ कर
लंबी उम्मीदों और अंतहीन इच्छाओं पर दिल मत लगाना, क्योंकि इस महफ़िल के लोग यह दास्तान अधूरी छोड़कर ही चले जाएँगे।
6
लबरेज़ जाम-ए-उम्र हुआ आ गई अजल
लो उठ गए भरा हुआ पैमाना छोड़ कर
जिंदगी का प्याला पूरा भर गया और मौत आ गई, और देखिए, हम उस भरे हुए पैमाने को छोड़कर दुनिया से उठ गए।
7
उस पीर-ज़ाल-ए-दहर की हम ठोकरों में हैं
जब से गई है हिम्मत-ए-मर्दाना छोड़ कर
जब से हमारी मर्दाना हिम्मत हमें छोड़कर गई है, तब से हम इस दुनिया रूपी बूढ़ी औरत की ठोकरों में पड़े हुए हैं।
8
पहरों हमारा आप में आना मुहाल है
कोसों निकल गया दिल-ए-दीवाना छोड़ कर
घंटों तक मेरा होश में आना नामुमकिन है, क्योंकि यह दीवाना दिल मुझे तन्हा छोड़कर मीलों दूर निकल गया है।
9
उतरा जो शीशा ताक़ से ज़ाहिद का है ये हाल
करता है रक़्स सज्दा-ए-शुकराना छोड़ कर
जैसे ही ताक़ से शराब की बोतल नीचे उतारी गई, तपस्वी (ज़ाहिद) का यह हाल हो गया कि वह ईश्वर के शुक्र का सजदा छोड़कर खुशी से नाचने लगा।
10
ये सुमअ'-ओ-रिया तो निशानी है कुफ़्र की
ज़ुन्नार बाँध सुब्हा-ए-सद-दाना छोड़ कर
यह दिखावा और पाखंड तो कुफ़्र की निशानी है, इसलिए सौ दानों वाली तसबीह को छोड़कर ज़ुन्नार (जनेऊ) बाँध लो।
11
रिंदान-ए-मय-कदा भी हैं ऐ ख़िज़्र मुंतज़िर
बस्ती में आइए कभी वीराना छोड़ कर
ऐ ख़िज़्र, मयकदे के शराबी भी आपका इंतज़ार कर रहे हैं; कभी वीराने को छोड़कर आबादी में भी आइए।
12
एहसान सर पे लग़्ज़िश-ए-मस्ताना का हुआ
हम दो क़दम न जा सके मय-ख़ाना छोड़ कर
मुझ पर अपनी मतवाली लड़खड़ाहट का यह एहसान रहा कि मैं मयख़ाना छोड़कर दो क़दम भी आगे नहीं जा सका।
13
वादी बहुत मुहीब है बीम-ओ-उमीद का
देखेंगे शेर पर दिल-ए-दीवाना छोड़ कर
डर और उम्मीद की यह घाटी बहुत भयानक है, लेकिन हम अपने दीवाने दिल को शेर पर छोड़ कर देखेंगे कि क्या होता है।
14
रो रो के कर रही है सुराही विदाअ' उसे
जाता है दूर दूर जो पैमाना छोड़ कर
सुराही रो-रो कर उस व्यक्ति को विदा कर रही है जो प्याले को छोड़कर उससे बहुत दूर जा रहा है।
15
तौबा तो की है 'नज़्म' बिना होगी किस तरह
क्यूँ-कर जिओगे मशरब-ए-रिंदाना छोड़ कर
ऐ 'नज़्म', तुमने तौबा तो कर ली है लेकिन शराब के बिना तुम्हारा गुज़ारा कैसे होगा? रिंदों (शराबियों) का बेपरवाह तौर-तरीक़ा छोड़कर तुम आख़िर कैसे ज़िंदा रहोगे?
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