“You took a vow of abstinence, Nazm, but how will you get by? / Having renounced the drinker's way, how will you live at all?”
ऐ 'नज़्म', तुमने तौबा तो कर ली है लेकिन शराब के बिना तुम्हारा गुज़ारा कैसे होगा? रिंदों (शराबियों) का बेपरवाह तौर-तरीक़ा छोड़कर तुम आख़िर कैसे ज़िंदा रहोगे?
इस शेर में शायर खुद से ही एक प्यारा सा सवाल कर रहे हैं कि नेकी की राह पर चलने के लिए तौबा तो कर ली, पर अब ज़िन्दगी कटेगी कैसे? यहाँ 'मशरब-ए-रिंदाना' सिर्फ शराब पीने की आदत नहीं, बल्कि बेबाक, आज़ाद और मस्तमौला होकर जीने का अंदाज़ है। शायर बड़ी सादगी से समझाते हैं कि अगर इंसान की रूह से मस्ती, इश्क़ और यह फकीराना तेवर ही निकल जाए, तो ऐसी बेरंग परहेज़गारी में भला जीना कैसे मुमकिन होगा!
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