ग़ज़ल
वस्ल की शब शाम से मैं गया
وصل کی شب شام سی مین گیا
Source: Kulliyat-e-Momin (old lithograph edition) · HI
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1
वस्ल की शब शाम से मैं गया
हालना हिजराँ का बला हो गया
मिलन की रात शाम से ही बीत गई, और विरह की हालत एक आफ़त बन गई।
2
दिल न पहरा जान ही ठहरी ख़ुदा
यह तो न-जानी कहीं वो तो गया
मैंने दिल की रखवाली नहीं की, बस जान ही ठहरी रही, ऐ ख़ुदा। यह बात तो मुझे मालूम ही न थी कि वह तो कहीं चला गया।
3
उठिए जल्दी से टपक को मैं
दिल ही नहीं बाग़ तही से देखो गया
जल्दी उठिए, क्योंकि मैं बूँद-बूँद करके ढल रहा हूँ; देखो, सिर्फ़ दिल ही नहीं बल्कि पूरा बाग़ भी अपनी गहराई तक ख़ाली हो गया है।
4
हुईं सियह रोज़ कि वो शम्अ-रू
शाम को आया था सहर को गया
मेरे दिन काले और अँधेरे हो गए, क्योंकि वह शम्अ जैसे चेहरे वाला शाम को आया था और सुबह होते ही चला गया।
5
ताले-ए-बरगश्ता मेरी क्या हरन
मुल्क-ए-अदम से न फिर अहू गया
मेरा भाग्य उल्टा हो गया है—अब कैसा हिरन, कैसा मृग? अदम (शून्यता) की भूमि से तो कोई हिरन कभी लौट कर नहीं आया।
6
साथ न चलने का बहाना तो देख
आगे मेरी नअश पे वो सो गया
साथ न चलने का बहाना तो देखो—वह मेरी अर्थी के आगे ही सो गया।
7
शोख़ी-ए-क़ातिल की मैं बान हूँ
कहती रही सब यह क्या दो गया
मैं अपने क़ातिल की शोख़ी का निशाना हूँ; वह बार-बार पूछती रही कि यह सब क्या हो गया।
8
सब्र नहीं शाम-ए-फ़िराक़ आजको
हक़ से कि बेज़ार थी तुम सो गया
आज जुदाई की इस शाम में सब्र नहीं रहा—ख़ुदा की क़सम, तुम इतनी थकी हुई थीं कि सो गईं।
9
शुक्र असर था गिला-ए-दुश्मनाँ
नाला मेरी काम से या रो किया
मैं आभारी था, यद्यपि शत्रु शिकायत और निंदा करते रहे; मेरी फ़रियाद क्या मेरे किसी काम आई, या वह केवल व्यर्थ ही रोती रही।
10
ज़ुल्फ़ की बू आएगी हमको मगर
ग़ैर की कहर दस्ता-ए-शब-बू गया
शायद ज़ुल्फ़ की ख़ुशबू हम तक पहुँच जाए, मगर शब-बू के फूलों का गुच्छा तो रक़ीब के ज़ालिम हाथ में चला गया।
11
हाय सनम हाय सनम लब पे क्यूँ
ख़ैरी मोमिन तुम्हें क्या हो गया
"हाय सनम, हाय सनम" — ये शब्द तुम्हारे होंठों पर क्यों हैं? ऐ धर्मपरायण मोमिन, तुम्हें आख़िर क्या हो गया है?
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