शोख़ी-ए-क़ातिल की मैं बान हूँ — मोमिन ख़ाँ मोमिन
“I am the mark of my slayer's playful mischief— all the while she kept asking: what has happened here?”
अर्थ
मैं अपने क़ातिल की शोख़ी का निशाना हूँ; वह बार-बार पूछती रही कि यह सब क्या हो गया।
विस्तार
यह शेर उस आशिक़ की बात करता है जो अपने महबूब की शरारत भरी बेरुख़ी का निशाना बन गया है। शायर कहता है कि वह मानो उस क़ातिल यानी महबूब की शोख़ी का तीर या निशाना है। इसमें एक मिठास है, क्योंकि यह दर्द भी जैसे गवारा है। इसी बीच आसपास के सब लोग हैरानी से पूछते रहते हैं कि आख़िर यह क्या हो गया, यह कैसी हालत है। आशिक़ तो इस चोट में भी ख़ुश लगता है, उस महबूब के जादू में बँधा हुआ जो उसे घायल करता है। यह उर्दू शायरी की वही भावना है जहाँ इश्क़ और तकलीफ़ साथ-साथ चलते हैं।
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