शुक्र असर था गिला-ए-दुश्मनाँ — मोमिन ख़ाँ मोमिन
“Thankful I was, though enemies would chide and blame; / my lament—did it work for me, or did it merely weep in vain?”
अर्थ
मैं आभारी था, यद्यपि शत्रु शिकायत और निंदा करते रहे; मेरी फ़रियाद क्या मेरे किसी काम आई, या वह केवल व्यर्थ ही रोती रही।
विस्तार
यह शेर शिकायत और विलाप की अनोखी शक्ति की बात करता है। शायर एक तरह के शुक्र के साथ कहता है कि दुश्मनों की शिकायत का भी असर दिखाई दिया। उसकी अपनी पुकार, उसका दिल से निकला नाला, अपना चुपचाप काम कर गया। यहाँ एक कोमल व्यंग्य छिपा है। कभी-कभी हमारे दुख और उनके शब्द जो हमारा बुरा चाहते हैं, दोनों हमारे मन पर छाप छोड़ जाते हैं और हमें अनजाने में गढ़ देते हैं। शायर इसे शुक्रगुज़ारी के भाव से स्वीकार करता है। वह मानता है कि पीड़ा और यहाँ तक कि दुश्मनी भी भीतर कुछ हिला देती है। यह हमें याद दिलाता है कि दिल की हर आवाज़, चाहे आह हो या शिकायत, कोई न कोई निशान ज़रूर छोड़ती है।
Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.
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