ग़ज़ल
लगी ख़दंग जब इस ग़मज़ा का सा
لگی خدنگ جب اس غمزہ کا سا
Source: Kulliyat-e-Momin (old lithograph edition) · HI
गीत सुनें
1
लगी ख़दंग जब इस ग़मज़ा का सा
फ़लक का हाल नहो क्या मेरी जिगर का सा
जब इस माशूक़ के नाज़-ओ-अदा का तीर लगा, तो आसमान का हाल भी मेरे ज़ख़्मी दिल जैसा हो गया।
2
सख़ावतकाही बहुत में में बख़ावन का
अगर नहोईगा नक़्शा तुम्हारी कहर का सा
मैं बहुत दानशीलता और प्रशंसा के उपहार लाता, अगर तुम्हारे क्रोध का भयानक चित्र न होता।
3
करे न ख़ाना-ख़राबी तेरी नदामत-ए-जौर
कि आब-ए-शर्म में है जोश चश्म-ए-तर का सा
कहीं अत्याचार पर तेरी शर्मिंदगी तेरा घर बरबाद न कर दे, क्योंकि शर्म के पानी में भी नम आँखों जैसा जोश और उबाल होता है।
4
ये जोश-ए-आशिक़ देखो कि अपनी क़त्ल की वक़्त
दुआयी सिल लगी वक़्त तन्हा असर का सा
आशिक़ के जोश को देखो कि अपने क़त्ल के वक़्त भी उसके होंठ दुआ में सिले रहे, जैसे तन्हाई में किसी असर में डूबा हुआ हो।
5
लगी उन आँखों से हर वक़्त ऐ दिल-ए-सद-चाक
तेरा न रुत्बा हुआ क्यूँ शिकाफ़-ए-दर का सा
ऐ सौ टुकड़ों में बँटे दिल, तेरी नज़र हर वक़्त उन आँखों पर टिकी रही; फिर भी तेरा दर्जा दरवाज़े की दरार जितना क्यों न हो सका?
6
ज़रा हो गर्मी-ए-सोहबत तो ख़ाक कर दी चर्ख़
मेरा सुरूर है गुलख़न्दा-ए-शरर का सा
अगर मेरी संगत की गर्मी ज़रा भी भड़क उठे तो मैं आकाश को राख कर दूँ; मेरी मस्ती उड़ती हुई चिंगारी की हँसती हुई खिलावट जैसी है।
7
बेह नातवाँ हूँ कि हूँ दर नज़र नहीं आता
मेरा भी हाल हुआ तेरी ही कमर का सा
मैं इतना कमज़ोर हूँ कि दिखाई तक नहीं देता; मेरी हालत भी तेरी पतली कमर जैसी हो गई है, जो नज़र में मुश्किल से आती है।
8
जुनून की जोश से बेगाना-वार हैं अहबाब
हमारा हाल वतन में हुआ सफ़र का सा
मेरे मित्र जुनून के जोश से अनजान और उदासीन हो गए हैं; अपने ही वतन में मेरी हालत ऐसी हो गई है जैसे मैं किसी सफ़र में हूँ।
9
ख़बर नहीं कि उसे क्या हुआ पर उस दर पर
निशान या नज़र आता है नामा-बर का सा
पता नहीं उसे क्या हुआ, मगर उस दरवाज़े पर कोई निशान या चिह्न दिखाई देता है, जैसे किसी संदेश ले जाने वाले का हो।
10
दिल ऐसी शोख़ को मोमिन ने दी या कि वो ही
मुहिब-ए-हुसैन का और दिल रहे शिमर का सा
मोमिन ने अपना दिल ऐसी चंचल महबूबा को दिया, या वही ऐसी निकली कि हुसैन के प्रेमी का दिल शिमर के दिल जैसा (निर्दयी) हो गया।
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