करे न ख़ाना-ख़राबी तेरी नदामत-ए-जौर — मोमिन ख़ाँ मोमिन
“Let not your remorse for cruelty lay your house to waste, for in the water of shame there surges a flood like weeping eyes.”
अर्थ
कहीं अत्याचार पर तेरी शर्मिंदगी तेरा घर बरबाद न कर दे, क्योंकि शर्म के पानी में भी नम आँखों जैसा जोश और उबाल होता है।
विस्तार
शायर अपने माशूक़ से कहते हैं, जिसने उन पर सितम किया है। उन्हें डर है कि उस सितम का पछतावा कहीं माशूक़ को ही बर्बाद न कर दे। क्यों? क्योंकि शर्म का जो पानी उनकी आँखों में उमड़ रहा है, उसमें आँसुओं जैसा ही जोश और उफान है। शायर को लगता है कि यह पछतावा, रोने की तरह, उनके घर को उजाड़ न दे। इसमें एक कोमलता है—सितम सहते हुए भी शायर नहीं चाहते कि माशूक़ अपने ही अपराध-बोध से दुखी हों। शर्म की लाली और आँसुओं का बहना यहाँ एक जैसे माने गए हैं, दोनों एक ज़बरदस्त उफान के साथ उठते हैं।
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