लगी उन आँखों से हर वक़्त ऐ दिल-ए-सद-चाक — मोमिन ख़ाँ मोमिन

लगी उन आँखों से हर वक़्त ऐ दिल-ए-सद-चाक तेरा न रुत्बा हुआ क्यूँ शिकाफ़-ए-दर का सा

“Fixed forever upon those eyes, O heart of a hundred rents, why did your rank not rise to match the crack within the door?”

— मोमिन ख़ाँ मोमिन

अर्थ

ऐ सौ टुकड़ों में बँटे दिल, तेरी नज़र हर वक़्त उन आँखों पर टिकी रही; फिर भी तेरा दर्जा दरवाज़े की दरार जितना क्यों न हो सका?

विस्तार

शायर अपने ही दिल से बात कर रहा है, जो सौ टुकड़ों में बँटा हुआ है। वह कहता है कि तेरी नज़र हर वक़्त उन प्यारी आँखों पर टिकी रहती है, हमेशा देखती, हमेशा तरसती। फिर वह एक नरम, दर्द भरा सवाल करता है, इतनी लगन के बावजूद तुझे दरवाज़े की दरार जितना मामूली दर्जा भी क्यों नहीं मिला? दरवाज़े की दरार तो कम से कम अंदर झाँक लेती है, उस पार की झलक पा लेती है। मगर तू, मेरे टूटे हुए दिल, इतना देखने के बाद भी वह छोटी सी नज़दीकी तक न पा सका। यह इश्क़ की बेबसी की एक कोमल शिकायत है, कि गहरी चाहत अक्सर कोई इनाम नहीं देती, महबूब की छोटी सी झलक भी नहीं।

Interpretation note: meanings and explanations may be AI-assisted and should not replace a primary text or scholarly edition. See the editorial policy.

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