ग़ज़ल
यकसू कुशादा-रवी पर चीं नहीं जबीं भी
यकसू कुशादा-रवी पर चीं नहीं जबीं भी
यह ग़ज़ल विरह और यादों के दर्द को व्यक्त करती है, जिसमें शायर अपने प्रिय की यादों में डूबा हुआ है। वह बताता है कि अब उसके लिए न तो किसी भी चीज़ का कोई महत्व है, न ही किसी सहारे का। यह प्रेम की गहन पीड़ा और अकेलेपन का भाव है।
गीत सुनें
1
यकसू कुशादा-रवी पर चीं नहीं जबीं भी
हम छोड़ी महर उस की काश उस को होवे कीं भी
जब कुश का फूल, सूरज और चाँद मेरे मन में नहीं हैं, तो मैं यह कामना करता हूँ कि मैंने अपने प्रिय के प्रेम को उनके लिए छोड़ दिया होता।
2
आँसू तो तेरे दामन पोंछे है वक़्त गिर्या
हम ने न रखी मुँह पर ऐ अब्र-ए-आस्तीं भी
समय ने तो तेरे दामन पोंछ दिए हैं और तेरी आस्तीन का बादल भी चला गया है, पर मैंने अपने चेहरे पर दिखावे का मुखौटा नहीं रखा।
3
करता नहीं अबस तो पारा गुलो-फ़ुग़ाँ से
गुज़रे है पार दिल के इक नाला-ए-हज़ीं भी
अगर कोई अबस तो पारा गुलो-फ़ुग़ाँ से गुज़रे है पार दिल के इक नाला-ए-हज़ीं भी।
4
हूँ एहतिज़ार में मैं आईना-रू शिताब आ
जाता है वर्ना ग़ाफ़िल फिर दम तो वापसीं भी
मैं तुम्हारे इंतज़ार में आईने जैसी शीतलता हूँ; अगर तुम नहीं आए, तो मेरा जाना भी बेखबर होगा।
5
सीने से तीर उस का जी को तो लेता निकला
पर साथों साथ उस के निकली इक आफ़रीं भी
सीने से तीर ने उसके जीवन को तो खींचा, पर साथ ही उसके दुख की एक आह भी निकली।
6
हर शब तिरी गली में आलम की जान जा है
आगे हवा है अब तक ऐसा सितम कहीं भी
हर रात तुम्हारी गली में मेरा दिल दुनिया की आत्मा की तरह भटकता है; हवा के बहाव में भी इतना अत्याचार कहीं नहीं है।
7
शोख़ी-ए-जल्वा उस की तस्कीन क्यूँके बख़्शे
आईनों में दिलों के जो है भी फिर नहीं भी
उसकी चंचल आभा से सुकून क्यों दिया? / आईनों में दिलों के जो हैं भी, फिर नहीं भी।
8
गेसू ही कुछ नहीं है सुम्बुल की आफ़त उस का
हैं बर्क़ ख़िर्मन-ए-गुल रुख़्सार-ए-आतिशीं भी
शायर कहता है कि बालों की तुलना उस टीले की विपत्ति से नहीं की जा सकती, क्योंकि चेहरे की आभा और आगी जैसी गाल भी उससे अधिक हैं।
9
तकलीफ़-ए-नाला मत कर ऐ दर्द दिल कि होंगे
रंजीदा राह चलते आज़ुर्दा हम-नशीं भी
तकलीफ़-ए-नाला मत कर ऐ दर्द दिल कि होंगे, क्योंकि आज राह चलते हमारा हम-नशीं भी रंजीदा है।
10
किस किस का दाग़ देखें यारब ग़म-ए-बुताँ में
रुख़्सत तलब है जाँ भी ईमान और दीं भी
यारब! किस-किस का दाग़ देखें ग़म-ए-बुताँ में? अब तो जान और ईमान, दोनों को रुख़सत तलब है।
11
ज़ेर-ए-फ़लक जहाँ टक आसूदा 'मीर' होते
ऐसा नज़र न आया इक क़ता-ए-ज़मीं भी
आसमान के विस्तार में, जहाँ मेरी आँखें बेचैन हैं, मिर्ज़ा ने कभी धरती की सतह का ऐसा नज़ारा नहीं देखा।
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