गेसू ही कुछ नहीं है सुम्बुल की आफ़त उस का — मीर तक़ी मीर

गेसू ही कुछ नहीं है सुम्बुल की आफ़त उस का हैं बर्क़ ख़िर्मन-ए-गुल रुख़्सार-ए-आतिशीं भी

“The hair is nothing compared to the calamity of the mound, for the splendor of the face and the fiery cheek are even greater.”

— मीर तक़ी मीर

अर्थ

शायर कहता है कि बालों की तुलना उस टीले की विपत्ति से नहीं की जा सकती, क्योंकि चेहरे की आभा और आगी जैसी गाल भी उससे अधिक हैं।

विस्तार

मिर्ज़ा तक़ी मीर साहब ने यहाँ दर्द और सौंदर्य का अद्भुत मेल किया है। शायर कहते हैं कि सुम्बल (खसखस) की पीड़ा तो कुछ भी नहीं है... वो तो बस एक छोटी सी बात है। असली आफ़त तो महबूब के रूप में है—गुल के हार की बिजली और उनकी आग जैसी सुर्ख़ गालें! यह शेर बताता है कि महबूब का सौंदर्य किसी भी दर्द से कहीं ज़्यादा गहरा और असरदार होता है।

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