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किस किस का दाग़ देखें यारब ग़म-ए-बुताँ में रुख़्सत तलब है जाँ भी ईमान और दीं भी

Which stains do we see, oh friend, in the sorrow of the homeland? We ask for the departure of both life and faith.

मीर तक़ी मीर
अर्थ

यारब! किस-किस का दाग़ देखें ग़म-ए-बुताँ में? अब तो जान और ईमान, दोनों को रुख़सत तलब है।

विस्तार

यह शेर उस गहरे एहसास को बयां करता है जब इंसान को लगता है कि उसका हर दाग़, हर ग़म, खुदा की नज़र में दिखाई दे रहा है। शायर कहते हैं कि वे इतने थक चुके हैं, इतनी निराशा में हैं कि वे अपनी ज़िंदगी, अपने ईमान और अपने दीन—तीनों से ही मुक्ति चाहते हैं। यह एक तरह की आत्मसमर्पण की भावना है, जब इंसान को लगता है कि अब सब कुछ बहुत भारी हो गया है।

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