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ग़ज़ल

सैर के क़ाबिल है दिल-सद-पारा उस नख़चीर का

सैर के क़ाबिल है दिल-सद-पारा उस नख़चीर का

यह ग़ज़ल उस नक़्शीरी (नख़चीर) की सुंदरता का वर्णन करती है, जो दिल के हर कोने में बसा है। कवि कहता है कि यह नक़्शीरी ऐसी है कि इसके हर टुकड़े में एक तीर की तरह गहरा एहसास छिपा है। यह एक ऐसा अद्भुत और रहस्यमयी अनुभव है जिसे दुनिया के खुले बाग़ भी नहीं समझ सकते।

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1
सैर के क़ाबिल है दिल-सद-पारा उस नख़चीर का जिस के हर टुकड़े में हो पैवस्त पैकाँ तीर का
दिल-सद-पारा उस नख़चीर का सैर के क़ाबिल है, जिसके हर टुकड़े में पैकाँ तीर का निशान हो।
2
सब खुला बाग़-ए-जहाँ इल्ला ये हैरान-ओ-ख़फ़ा जिस को दिल समझे थे हम सो ग़ुंचा था तस्वीर का
सारा बाग़-ए-जहाँ खुला है, बस यह हैरान और उदास मन है, जिसे हमने दिल समझा था, वह तो बस तस्वीर का एक कली मात्र था।
3
बू-ए-ख़ूँ से जी रुका जाता है बाद-ए-बहार हो गया है चाक दिल शायद कसो दिल-गीर का
बू-ए-ख़ूँ की महक से साँसें थम जाती हैं, ऐ बहार की हवा। शायद दिल ही दिल-लगाने वाले का एक जाल बन गया है।
4
क्यूँके नक़्काश-ए-अज़ल ने नक़्श अबरू का किया काम है इक तेरे मुँह पर खींचना शमशीर का
क्यूँके नक़्काश-ए-अज़ल ने नक़्श अबरू का किया। काम है इक तेरे मुँह पर खींचना शमशीर का।
5
रहगुज़र सैल-ए-हवादिस का है बे-बुनियाद-ए-दहर इस ख़राबे में करना क़स्द तुम ता'मीर का
यह मार्ग समय में निराधार घटनाओं के प्रवाह का है; इस तबाही में तुम मरम्मत करने का इरादा मत करो।
6
बस तबीब उठ जा मिरी बालीं से मत दे दर्द-ए-सर काम याँ आख़िर हुआ अब फ़ाएदा तदबीर का
बस तबीब, उठ जा मेरी बालीं से मत दे दर्द-ए-सर। काम याँ आख़िर हुआ अब फ़ाएदा तदबीर का।
7
नाला-कश हैं अहद-ए-पीरी में भी तेरे दर पे हम क़द्द-ए-ख़म-गश्ता हमारा हल्क़ा है ज़ंजीर का
तेरे दर पर हम ऐसे हैं, जैसे नला-कश हैं तेरी पवित्रता के वादे में भी; हमारा शरीर तो एक हार है, जो ज़ंजीरों के घेरे में बंधा है।
8
जो तिरे कूचे में आया फिर वहीं गाड़ा उसे तिश्ना-ए-ख़ूँ में तो हूँ उस ख़ाक-ए-दामन-गीर का
जिसने तुम्हारे आँगन में प्रवेश किया, मैंने अपना दिल वहीं बसा लिया है; क्योंकि तुम्हारे आँचल की धूल ही खून के प्यासी है।
9
ख़ून से मेरे हुई यक-दम ख़ुशी तुम को तो लेक मुफ़्त में जाता रहा जी एक बे-तक़सीर का
मेरे खून से मुझे इतनी खुशी मिली, तुम को ले जाते हुए, कि मेरा दिल बिना किसी माप या फ़िक्र के बहता रहा।
10
लख़्त-ए-दिल से जूँ छिड़ी फूलों की गूंधी है वले फ़ाएदा कुछ जिगर इस आह-ए-बे-तासीर का
दिल के घाव से फूलों का गुच्छा निकल आया है, ऐ जिगर, इस बेकार आह का क्या फ़ायदा?
11
गोर-ए-मजनूं से जावेंगे कहीं हम बे-नवा ऐब है हम में जो छोड़ें ढेर अपने पीर का
हम कहीं से प्यारे मजनू के नहीं जाएँगे, क्योंकि हम में ऐसी खामियाँ हैं कि अपने पीर का बहुत कुछ छोड़ देते हैं।
12
किस तरह से मानिए यारो कि ये आशिक़ नहीं रंग उड़ा जाता है टक चेहरा तो देखो 'मीर' का
यारों, आप लोग कैसे मानेंगे कि मैं आशिक़ नहीं हूँ? मेरे चेहरे का रंग देखो, 'मीर' का।
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