ग़ज़ल
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
यह ग़ज़ल वियोग और विरह के भाव को व्यक्त करती है, जहाँ शायर अपने दिल की हालत का वर्णन करता है। वह यह सवाल करता है कि क्या कोई और उसके दिल का हाल जान सकता है, क्योंकि न तो फूल (गुल) और न ही बाग़ का पूरा हाल जान सकता है। यह प्रेम की जटिलता और अनिश्चितता को दर्शाती है।
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1
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है
हर पत्ता और हर कली हमारी हालत जानता है। पर चाहे वह जाना जाए या न जाना जाए, पूरा बाग़ सब कुछ जानता है।
2
लगने न दे बस हो तो उस के गौहर-ए-गोश को बाले तक
उस को फ़लक चश्म-ए-मह-ओ-ख़ुर की पुतली का तारा जाने है
बस उसके गहने-से नयन को बाले तक, उसे फ़लक चश्म-ए-मह-ओ-ख़ूर की पुतली का तारा जाने है।
3
आगे उस मुतकब्बिर के हम ख़ुदा ख़ुदा किया करते हैं
कब मौजूद ख़ुदा को वो मग़रूर-ए-ख़ुद-आरा जाने है
आगे उस घमंडी व्यक्ति के हम ईश्वर-ईश्वर करने लगे हैं, कब वह घमंडी, स्वयं को सजाने वाला व्यक्ति ईश्वर के अस्तित्व को जानेगा।
4
आशिक़ सा तो सादा कोई और न होगा दुनिया में
जी के ज़ियाँ को इश्क़ में उस के अपना वारा जाने है
इस दुनिया में आशिक़ सा सादा कोई और नहीं होगा, जिसे इश्क़ में अपना पूरा दिल और जान समर्पित कर सके।
5
चारागरी बीमारी-ए-दिल की रस्म-ए-शहर-ए-हुस्न नहीं
वर्ना दिलबर-ए-नादाँ भी इस दर्द का चारा जाने है
दिल की बीमारी का कोई रिवाज नहीं है, वर्ना नासमझ प्रिय भी इस दर्द का इलाज जानता होता।
6
क्या ही शिकार-फ़रेबी पर मग़रूर है वो सय्याद बचा
ताइर उड़ते हवा में सारे अपने असारा जाने है
वह शिकारी, जो धोखेबाज़ और गुमराह है, अपने आप पर घमंड करता है। हवा में उड़ने वाला पक्षी भी अपने सभी सहारे खो चुका है।
7
मेहर ओ वफ़ा ओ लुत्फ़-ओ-इनायत एक से वाक़िफ़ इन में नहीं
और तो सब कुछ तंज़ ओ किनाया रम्ज़ ओ इशारा जाने है
मेहर, वफ़ा, लुत्फ़ और इनायत जैसे भावों से कोई वाक़िफ़ नहीं है; लेकिन तंज़, किनाया, रम्ज़ और इशारा सब कुछ जाना-पहचाना है।
8
क्या क्या फ़ित्ने सर पर उस के लाता है माशूक़ अपना
जिस बे-दिल बे-ताब-ओ-तवाँ को इश्क़ का मारा जाने है
माशूक़ अपना क्या-क्या फ़ित्ने सर पर लाता है, जिस इंसान को इश्क़ के बुखार से गुज़रना है, जिसका दिल बे-दिल और बे-ताब-ओ-तवाँ है।
9
रख़नों से दीवार-ए-चमन के मुँह को ले है छुपा या'नी
इन सूराख़ों के टुक रहने को सौ का नज़ारा जाने है
क्या आपने रख़नों से दीवार-ए-चमन के मुँह को छिपा दिया है, या या'नी, इन छोटे-छोटे छेद के टुकड़े को सौ का नज़ारा अज्ञात है।
10
तिश्ना-ए-ख़ूँ है अपना कितना 'मीर' भी नादाँ तल्ख़ी-कश
दम-दार आब-ए-तेग़ को उस के आब-ए-गवारा जाने है
मेरा अपना खून का प्यासा होना ऐसा है कि आप, ऐ मीर, भी नादान और कड़वे ज़ायके वाले हैं। वह व्यक्ति, जिसका पानी तलवार का सार है, वह आसानी के पानी को कैसे जान सकता है।
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