ग़ज़ल

पलकों पे थे पारा-ए-जिगर रात

पलकों पे थे पारा-ए-जिगर रात

यह ग़ज़ल किसी बिछड़े या महबूब के यादों में गुज़रे वक़्त के दर्द को बयां करती है। शायर ने अपनी आँखों और दिल में बसी यादों को एक रात की तरह बताया है, जिसमें वफ़ा और उम्मीदें हर गुज़रते पल के साथ फीकी पड़ गई हैं। यह उन लम्हों का वर्णन है जब प्रिय का साथ न होने से दिल लगातार रोता रहता है।

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लिपि व अर्थ
1
पलकों पे थे पारा-ए-जिगर रात हम आँखों में ले गए बसर रात
पलकों पर जिगर की बेचैनी रात भर थी, और हमने पूरी रात अपनी आँखों में ही बिता दी।
2
इक दिन तो वफ़ा भी करते वा'दा गुज़री है उमीद-वार हर रात
एक दिन तो वफा भी करते वादा, गुज़री है उम्मीद-वार हर रात। (अर्थात, कभी-कभी वफादारी भी वादे करती है, और हर रात उम्मीदों से भरी गुज़री है।)
3
मुखड़े से उठाईं उन ने ज़ुल्फ़ें जाना भी न हम गई किधर रात
उन्होंने अपने माथे से ज़ुल्फ़ें उठाईं; मैं यह भी नहीं जान पाई कि वह कहाँ गईं और रात कहाँ गई।
4
तू पास नहीं हुआ तो रोते रह रह गई है पहर पहर रात
अगर आप पास नहीं हुए तो रोते रह गई है हर गुजरती रात के हर पल।
5
क्या दिन थे कि ख़ून था जिगर में रो उठते थे बैठ दोपहर रात
क्या दिन थे जब जिगर में खून बहता था, दोपहर और रात में बैठकर रोना उठना स्वाभाविक था।
6
वाँ तुम तो बनाते ही रहे ज़ुल्फ़ आशिक़ की भी याँ गई गुज़र रात
तुम तो बस ज़ुल्फ़ संवारती ही रहीं, और आशिक़ के लिए भी रात गुज़र गई।
7
साक़ी के जो आने की ख़बर थी गुज़री हमें सारी बे-ख़बर रात
साक़ी के आने की खबर मात्र ही पूरी बेखबर रात गुज़र गई।
8
क्या सोज़-ए-जिगर कहूँ मैं हमदम आया जो सुख़न ज़बान पर रात
हे हमदम, मैं अपने हृदय का क्या दुख कहूँ, जब रात में ज़बान पर इतना मीठा काव्य आया है।
9
सोहबत ये रही कि शम-रवी ले शाम से ता-दम-ए-सहर रात
सोहबत ऐसी रही कि शाम की रोशनी, रात को सुबह के उजाले जैसा महसूस करा गई।
10
खुलती है जब आँख शब को तुझ बिन कटती नहीं आती फिर नज़र रात
जब आँखें रात को तेरे बिना खुलती हैं, तब नज़र रात भर नहीं रुकती।
11
दिन वस्ल का यूँ कटा कहे तू काटी है जुदाई की मगर रात
दिन मिलन का यूँ कटा कहे तू, काटी है जुदाई की मगर रात।
12
कल थी शब-ए-वस्ल इक अदा पर उस की गए होते हम तू मर रात
कल रात मिलन की एक अदा पर, हम दोनों उस रात में खो गए।
13
जागे थे हमारे बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता पहुँचा था बहम वो अपने घर रात
हमारे भाग्य अस्थिर और बेचैन थे, जब वह रात को अपने घर पूरी तरह से खोया हुआ पहुँचा।
14
करने लगा पुश्त-ए-चश्म-ए-नाज़ुक सोते से उठा जो चौंक कर रात
नाजुक आँखों की नस खींचने लगा, जो चौंक कर नींद से जागी रात।
15
थी सुब्ह जो मुँह को खोल देता हर-चंद कि तब थी इक पहर रात
जब सुबह मुख को खोल देती थी, तब हर-चंद में एक पहर रात थी।
16
पर ज़ुल्फ़ों में मुँह छपा के पूछा अब होवेगी 'मीर' किस क़दर रात
ज़ुल्फ़ों में मुँह छिपाकर मैंने पूछा, 'मीर,' कि अब और रात कितनी बाकी है?
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